Read this article in English: British Spy At The Heart Of Padmavati Controversy

पद्मावती विवाद के गर्भ में छिपा षडयंत्र न केवल भारतीय समाज के लिए, बल्कि पूरी दुनिया की  सभ्यताओं के लिए दो बहुत गंभीर समस्याएं खड़ा करता है। सबसे पहले ब्रिटिश द्वारा फर्जी भारतीय इतिहास का निर्माण है जो कि दूसरी समस्या का मार्ग प्रशस्त करता है – काल-निर्धारण में हमारे स्थान की जागरूकता की कमी। क्योंकि हमने अभी तक इन मुद्दों का समाधान नहीं किया है, हम आज भी इसी गड़बड़ी में फंसे हुए हैं।

पद्मावती विवाद ने कई सिद्धांतों को जन्म दिया और अनेक भारतीय बुद्धिजीवियों को उत्साहित किया। न केवल राजनेताओं, मशहूर हस्तियों या कार्यकर्ताओं ने बल्कि इतिहासकारों ने भी इस मुद्दे को खूब प्रचारित किया। हालांकि कुछ इतिहासकारों ने पद्मावती के अस्तित्व पर सवाल उठाए हैं, जबकि अन्य ऐसे हैं जो कहानी पर विश्वास करते हैं लेकिन खुद को अलाउद्दीन खिलजी की समय-सीमा के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ पाते हैं। अंत में हम ऐसी स्थिति में हैं जहां इतिहासकार सभी उपलब्ध विवादित जानकारी को जाँजने में सक्षम नहीं हैं और एक सुसंगत कथा पर सहमत होने में असमर्थ हैं। जब इतिहासकार स्वयं एक उचित ऐतिहासिक साक्ष्य प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं, तो हम बाकी लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?

ब्रिटिश जासूस जेम्स टॉड जिसकी लिखी गयी पुस्तक पद्मवती विवाद के मूल में है।

पद्मावती विवाद के मूल में जेम्स टॉड नाम के एक ब्रिटिश खुफिया अधिकारी है, और ये संपूर्ण बहस उसी पर निर्भर है। भारत पर आक्रमण करने के लिए सबसे नवीनतम विदेशियों होने के नाते, ब्रिटिश अपने स्वयं के आगमन के लिए न्यायोचित समर्थन चाहते थे। एडवर्ड गिब्बॉन ने 1776 में जब ब्रिटेन ने अमेरिका में अपनी 13 कॉलोनियों को खो दिया था, तब रोमन साम्राज्य का इतिहास, द हिस्ट्री ऑफ द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ द रोमन इम्पाइर  का पहला खंड प्रकाशित किया| गिब्बन के काम का एक केंद्रीय विषय उनकी पैक्स ब्रिटैनिका – ब्रिटिश-प्रभुत्व वाले विश्व व्यवस्था की अवधि – और पैक्स रोमाना  के बीच ऐतिहासिक संबंधों की खोज थी|

उन्होंने एक ऐसे सिद्धांत के लिए आधारशिला प्रदान की जो ब्रिटिश औपनिवेशिक उद्यम और ब्रिटिश के भारत पर कब्जा करने को वैध बनाता है। 19वीं शताब्दी तक, ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों की एक नई पीढ़ी भारत के इतिहास की विद्वान बन गई। वे खुद को उत्तरार्द्ध सिकंदर द ग्रेट्स के रूप में कल्पना करने लगे। उन्होंने भौगोलिक, लोक और वस्तुओं के खातों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया, जो कि भारत को यूनानियों से जोड़ते हैं, और अतीत के रोमनों को। अलेक्जेंडर बर्नेस, जेम्स टॉड, रिचर्ड एफ बर्टन और एडवर्ड बी ईस्टविक उनमें सबसे प्रमुख थे।

इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियोजित, जेम्स टॉड ने भारत के अतीत को ब्रिटिश शाही प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में राजस्थान के इतिहास और प्राचीन वस्तुएं लिखीं। यह प्रकाशित कार्य इस पूरे पद्मावती विवाद के लिए और साथ ही साथ भारतीय इतिहास में फेरबदल के लिए एक बहुत विशिष्ट मार्कर के रूप में कार्य करता है। एक बार यह किताब ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता में निर्यात की गई, तब इसे बंगाली कथाओं में भी शामिल किया गया और आज भी इतिहासकारों के एक वर्ग द्वारा इसका उल्लेख किया जाता है, इस तथ्य के बावजूद कि यह काम पूरी तरह से धोखाधड़ी साबित हुआ है।

जेम्स टॉड के प्रमुख जीवनी लेखक जेसन फ्रीटाग ने अपनी पुस्तक सर्विंग एम्पायर, सर्विंग नेशन: जेम्स टॉड और राजपूत राजस्थान में जेम्स टॉड की संदिग्ध व्याख्याओं पर प्रकाश डाला है, जिसे साबित करने के लिए अपर्याप्त साक्ष्य का सहारा लेते है, जिन्हे अब अविश्वसनीय माना जाता है। एक और किताब जो जेम्स टॉड की जानबूझकर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ को बेनकाब करता है, वह राम्या श्रीनिवासन द्वारा लिखी गई एक पुस्तक एक राजपूत रानी के बहुत से जीवन: भारत का वीर अतीत है। अपने काम में राम्या दर्शाती है कि जेम्स टॉड का राजपूत पहचान का निर्माण केवल औपनिवेशिक परियोजना का एक हिस्सा नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का एक हिस्सा भी इससे काफ़ी प्रभावित था।

आज भी टोड उन लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता है जिनके पूर्वजों ने उन्हें अच्छी रोशनी में प्रलेखित किया था। 1997 में, महाराणा मेवर चैरिटेबल फाउंडेशन ने ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियोजित इस ब्रिटिश खुफिया अधिकारी के नाम पर एक पुरस्कार की स्थापना की। यह पुरस्कार उन आधुनिक गैर-भारतीय लेखकों को दिया जाता है जो “टॉड के काम का उदाहरण देते हैं”। मेवार प्रांत में, जेम्स टॉड के सम्मान में एक गांव को “टॉडगढ़” नाम दिया गया है। यह भी दावा किया जा रहा है कि टॉड वास्तव में कर्म और पुनर्जन्म की प्रक्रिया के परिणाम के रूप में एक राजपूत था।

वर्तमान भारतीय नेताओं के लिए ब्रिटिश विद्वानों या सैन्य रणनीतिकारों की प्रशंसा करना स्वाभाविक है और यह एक आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यहां तक कि आज भी अंग्रेजों के साथ सम्मोह हमारे राष्ट्रवादी नेतृत्व पर छाई हुई है, जो भारत की विदेशनीति पर प्रेरणा के लिए भी लार्ड पामरस्टोन और हेनरी किसिंजर जैसे औपनिवेशिक रणनीतिकारों के आगे सर झुकाते है और उनकी मिसाल कॉलेज के बच्चों को भी देते है। पामरस्टन – जिसका सिद्धांत मध्य एशिया के सभी भयानक युद्धों और भारत के विखंडन के लिए जिम्मेदार है। किसिंजर – जो 1971 के युद्ध के दौरान उत्तर से चीनी को उकसा कर और पूर्व से अमेरिकी सातवें बेड़े और पश्चिम से रॉयल नेवी के साथ भारत का विभाजन करने के लिए तैयार था।

भौगोलिक दृष्टि से भारत को दुनिया के बाकी हिस्सों से काटने की यह बहुत ही जबरदस्त रणनीति थी और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय इतिहास की हॉलीवुड शैली में उत्पादन के लिए जेम्स टॉड जैसे ब्रिटिश खुफिया अधिकारी को रोजगार दिया था। टॉड का प्रारंभिक मिशन मेवाड़, कोटा, सिरोही, बूंदी और बाद में मारवार और जैसलमेर के पहाड़ी क्षेत्रों का सर्वेक्षण करना था। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इन क्षेत्रों को खैबर दर्रा के माध्यम से उत्तर से रशिया-भारतीय अग्रिमों के विरुद्ध एक बफर ज़ोन माना जाता था।

सालों तक कई भारतीय राज्यों ने रसियन, फ्रांसीसी और जर्मन लोगों के साथ गठबंधन किया, ताकि अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ा जा सके और ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त किया जा सके। एक संयुक्त इंडो-रशियन, इंडो-फ्रांसीसी या इंडो-जर्मन सेना जो उत्तर भारतीय सीमा से हमले शुरू करें और साथ ही साथ देश के भीतर एक विद्रोह के डर से ब्रिटिश सैन्य रणनीतिकार आतंकित थे, जब तक की वे पश्चिम, उत्तरी और पूर्वी मोर्चों पर बफर जोन बना कर भारत छोड़ गए।

बोखरा में भेस बदलकर छिपे ब्रिटिश खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर बर्नस

जेम्स टॉड के काम का उद्देश्य राजपूताना और मुगल राजाओं के बीच भ्रम फैलाकर और विभिन्न हिंदू संप्रदायों और मुसलमानों को विखंडित करके ब्रिटिश के खिलाफ सामूहिक विद्रोह के इस खतरे को समाप्त करना था। उसी समय यह विभाजन और शासन रणनीति ब्रिटिश साम्राज्य में अन्य जगहों पर भी खेली जा रही थी। जैसे जेम्स टॉड भारत में राजपूताना अभिमान के उद्धारकर्ता के रूप में पेश किया गया था, एक अन्य ब्रिटिश खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर बर्नेस को अफगानिस्तान में अफगानों और रूसियों के बीच एक दरार बनाने के लिए मुसलमान के रूप में प्रच्छन्न काबुल से बोखरा भेजा गया था। जब अफगानों ने रूसी लोगों की मदद से बर्न्स को पहचान लिया, तो उसे स्थानीय बाजार में एक खूटी पे तांग कर फांसी दे दी। जेम्स टॉड इस मामले में तो काफी भाग्यशाली था। आज तक भारतीयों ने कभी जेम्स टॉड की असली पहचान के बारे में जानने की कोशिश नहीं की।

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Shelley Kasli
Shelley Kasli is the Co-founder and Editor at GreatGameIndia, a quarterly journal on geopolitics and international affairs. He can be reached at shelley.kasli@greatgameindia.com