Read in English here: Ivanka Trump: Santa Claus From Uncle Sam

ग्लोबल इंटरप्रेन्योर समिट के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी ​​​​इवांका ट्रम्प हैदराबाद में है। ​​सेंटा क्लॉज की तरह वह भारत के लिए कई सारे उपहार लेकर आई है ​ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दिवालिया पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में सुधार लाने के लिए भारत की लूट निरंतर जारी रहे। लेकिन अन्य सभी उपहारों में से भारत के लिए एक बहुत ही खास खिलौना है: सुपरपरॉवर।

90 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के साथ हमने हमारे कुशल वित्तीय प्रणाली के मूल सिद्धांतों का बलिदान किया जिसने पिछले 50 वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रखा था। चूंकि इन मूल सिद्धांतों को धीरे-धीरे खत्म किया गया, इसलिए नई अवधारणाएं अपवाद के बजाय आदर्श बन गईं।

भारतीय आर्थिक और बैंकिंग के बुनियादी सिद्धांत की सुदृढता पर विभिन्न वित्त मंत्रियों के आश्वासन के बावजूद भारत ने हर 7 साल में वित्तीय बाजारों की मंदी देखी है। ​हम अब यह जानने लगे हैं कि कसीनो स्टाइल जुआ हमारी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करता है और जो कि हमारे दृष्टिकोण में कुछ संरचनात्मक रूप से गलत है।

​विकास ​​का मिथक और सुपरपॉवर बनने की मृगतृष्णा – भारत के उत्तराधिकारी बनने के ‘दृष्टिकोण’ ने भारत में हर किसी को अँधा कर दिया है। ​पश्चिम द्वारा बनाई गई ग़लत दृष्टि हमें गलत दिशाओं में ले जा रही है जिससे हम जीएसटी को बिना समझे आज उसके साथ खड़े हैं।

गुट निरपेक्ष आंदोलन (NAM) ​का नेता होते हुए भी हम न केवल अमेरिकी आर्थिक संरचन का अंग बन गये हैं बल्कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था का भी एक अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। विनाश – जो अमेरिका में आर्थिक जीवन के हर दौर को प्रभावित करने के लिए बाध्य है, भारत में फैल रहा है और हमें इसके साथ-साथ विस्मरण के लिए ले जा रहा है।

​उदाहरण के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी इवांका ट्रंप की यात्रा के दौरान भारत के 3500 पुलिसकर्मी, इंटेलीजेंस ब्यूरो, विशेष खुफिया दस्ता, काउंटर-इंटेलीजेंस टीम और विशेष शाखा के सुरक्षा कर्मचारी 4 एवं 5 परत में काम करेंगे लेकिन वे इसके लिए भारत से नहीं बल्कि अमेरिका की सीक्रेट सर्विस से सीधे ऑर्डर लिया करेंगे।

​ऐसे समय में जब हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियां और बैंक अपने इन्वेस्टिगेशन विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों को आउट्सोर्स कर रहे हैं या उन्हें इसका ठेका दे रहे हैं, क्या ऐसी स्थित में हम सुपर पावर बनने की राह पर हैं? आखिर भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तवकता क्या है?

​हम गर्व से भारत-अमेरिकी सामरिक साझेदारी का प्रदर्शन दुनिया के सामने करते हैं जबकि अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियां हमारे सागरिका युद्धपोत, धनुष बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम्स और परमाण्विक हथियारों की बेतहाशा जासूसी करती है और हम एक सवाल भी नहीं उठाते हैं। और ना ही इसे एक मुद्दा बनाते हैं। क्या हमारे पास कोई शर्म बची है या नहीं?

​यद्यपि इसके पहले से यह निष्कर्ष निकाला गया था कि भारतीय संसाधनों का अमेरिका द्वारा जमकर दोहन किया जाएगा जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके। लेकिन जिस गति से अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट दिग्गजों ने अपने अस्तित्व को आगे बढ़ाने के लिए भारत के विकास का इस्तेमाल किया, वह सभी का ध्यान आकर्षित करने वाला प्रश्न है।

​बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उदारीकरण और निजीकरण की विचारधारा उनके पूर्ववर्ती ईस्ट इंडिया कंपनी के समान हैं। जिसने 200 साल पहले कई देशों में अपने लूट का साम्राज्य फैलाया और अफ्रीका, भारत, चीन जैसे देशों के हर उपलब्ध आर्थिक संसाधन को नष्ट कर दिया था, जो कि उनके औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के अस्तित्व और पुनर्निर्माण के लिए थे।

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान भी इन विचारधाराओं को मुक्त व्यापार एवं वैश्वीकरण के रूप में जाना जाता था जिसने भारत के क्रूर शोषण के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया था। कई महान नेताओं के बलिदानों के कारण अभी मात्र सात दशक पहले ही हम उनके चंगुल से छूटकर बाहर आये हैं।

कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में अत्यधिक शक्ति को ध्यान में रखते हुए खतरे का आकलन अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने 100 साल पहले किया, जब उन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी के एकाधिकार को अपने एक ऐतिहासिक फैसले से तोड़ दिया

​एक प्रतिशोध के साथ ही वह निर्णय 100 साल से कम समय में उल्टा गया और उसी तरह लगभग समान नामों के साथ औद्योगिक घराने विजयी होकर उभरने लगे, इस प्रक्रिया ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कई नयी कंपनियों की स्थापना की जो अब अपने पैरों को भारत में फैल रहे हैं।

पहले हमने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए हमारे प्रमुख क्षेत्रों को खोला। समय की अवधि में हमने धीरे-धीरे एफडीआई (FDI) की हिस्सेदारी बढ़ाई, हमने नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) नियमों की उपेक्षा की। और धीरे-धीरे हम घरेलू और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हमारे पैसे उधार देते हैं और उन्हें अनुत्पादक क्षेत्रों में निवेश करने की अनुमति देते हैं। और हम आँख बंद करके कहते हैं कि हम जीएसटी का समर्थन करते हैं।

​निर्यात के नाम पर हमने सॉफ्टवेयर निर्यात को प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही भारतीयों के लिए नौकरियां पैदा करने में हमने सिर्फ आईटी जगत को हाईलाईट किया लेकिन इस अंधी दौड़ में हमने भारत के टेक्सटाइल और अन्य उद्द्योगों पर समुचित मात्र में ध्यान नहीं दिया । यहां तक कि हमारी कृषि भूमि का भी प्रयोग SEZ के तहत औद्योगिक उपयोग के लिए कर लिया गया। भारत-अमेरिकी संबंधों की यह वास्तविकता है।

जीएमओ (GMO) की शुरूआत ने कपास के उत्पादन को बुरी तरह से प्रभावित किया और कृषि क्षेत्र में आत्मघाती मौतें शुरू हुईं। भारत में रसायनों के भारी उपयोग की वजह से कृषि भूमि की उत्पादकता लगातार घटती जा रही है। भारत के कृषि क्षेत्र को नष्ट करने की Rs 1.4 ट्रिलियन की योजना के बारे में यहां पढ़ें।

पश्चिम द्वारा निर्मित ​सुपर शक्ति के जुमले पर हमने आँख बंद करके अपने विकास के लिए भारी उधार लिया। अंतर्राष्ट्रीय ऋण मुद्रास्फीति और ब्याज दर के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। आखिर भारत-अमेरिका संबंधों के पीछे की वास्तविकता क्या है? जब बोलीविया जैसे देश केंद्रीय बैंकरों से स्वतंत्रता की घोषणा कर सकते हैं तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता है? कृपया मुझे बताएं कि हम केंद्रीय बैंकरों के दास क्यों बने बैठे है?

अब वापस आते हैं हम इवांका ट्रंप की भारत यात्रा पर। यह कहा जा रहा है कि वह “न सिर्फ शब्दों में बल्कि एक्शन लेने में भी महिला आर्थिक सशक्तीकरण की चैंपियन रही है” और वह भारत में भी इसे बढ़ावा देने के लिए तैयार है। लेकिन सच्चाई से आगे कुछ भी नहीं हो सकता है।

जब इवांका ट्रंप महिलाओं के सशक्तिकरण की ग्लोबल इंटरप्रेन्योर समिट में बात करती हैं​ ​तो वह उन असहज सवालों के उत्तर देने से साफ़ इंकार कर देती हैं जो उनके फैशन ब्रांड के बारे में पूछे जाते हैं। उन कामगारों की हालत क्या है जो भारत में ट्रंप की कंपनी के लिए काम करते हैं?

जब इवांका ट्रंप ग्लोबल इंटरप्रेन्योर समिट में अपना व्याख्यान दे रही होती है जिसका विषय “सभी के लिए महिला प्रथम समृद्धि” है, तो क्या वह अपनी कंपनी के बारे में भी कह रही होगी, जहां श्रमिक कम मजदूरी, मौखिक दुरुपयोग और यौन उत्पीड़न जैसी चीजें झेलते हुए कुछ महीने में केवल करीब 100 डॉलर (Rs 6500) ही कमाते हैं?

चीन के मजदूर इवांका ट्रंप के लिए जूते और हैण्डबैग का निर्माण करते हैं, इंडोनेशिया के मजदूर ट्रंप के लिए उनके ड्रेस सिलते हैं जबकि वियतनाम में उनके सूट और जैकेट निर्मित किये जाते हैं। इसी तरह भारत में उनके कॉटन टॉप और जींस बंगलादेश में बनाये जाते हैं, यह बिलकुल उसी तरह है जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी काम करती थी।

अमेरिकी बंदरगाहों पर पहुंचने वाले कंटेनरों के अमेरिकी सीमा शुल्क रिकॉर्डों की जांच करने के लिए एक वैश्विक व्यापार डेटाबेस Panjiva का उपयोग करते हुए वाशिंगटन पोस्ट ने विदेशी कारखानों की पहचान की है जिन्होंने ट्रम्प की कंपनी के लिए माल तैयार किया है​। उन्होंने इवांका ट्रम्प के ब्रांड की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला ​​का मानचित्रण किया ​है​​।

पश्चिम में प्रचलित एक मिथक के विपरीत जो कि अब पूर्व द्वारा स्वीकार किया गया है – यह हमेशा दुनिया के गरीब राष्ट्र हैं जिन्होंने समृद्ध देशों को वित्तपोषित किया है और अन्यथा नहीं। और ​इस मिथक को बनाए रखने के लिए ही इवांका ट्रंप ग्लोबल इंटरप्रेन्योर समिट में हैं।

​मध्यकाल में जब बैजन्टाइन साम्राज्य का पतन हुआ और कांस्टेनटिनोपल ढहने लगा तब यूरोपीय राजपरिवारों ने अपनी अर्थव्यवस्था और खुद के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए एशिया (भारत और चीन) की तरफ देखा. उसी का परिणाम था कि उन्होंने खुद को बचाए रखने के लिए इन दोनों सभ्यताओं को ना ही मात्र बर्बादी की कगार पर धकेल दिया बल्कि जमकर लूटा। ​इवांका ट्रंप का ग्लोबल इंटरप्रेन्योर समिट में होना ​​प्रतीकात्मक है।

​यह समय है आत्मपरीक्षण करने का और गंभीरता से सोचने का कि, हम अंधे होकर देश के विकास के लिए जिस पश्चिमी मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं वह हमें आर्थिक रूप से तो बर्बाद करेगा ही साथ ही हमारी सभ्यता और संस्कृति को भी जड़ों से खत्म कर देगा।

पढ़ें कैसे दिवालिया पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में सुधार लाने के लिए भारत की लूट निरंतर जारी है और कैसे विमुद्रीकरण – जो एक बड़ा घोटाला है यह बात सुनिश्चित कर्ता है। यह नकद पर युद्ध (War on Cash) के रूप में दुनिया भर में जाना जाता है।

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Shelley Kasli
Shelley Kasli is the Co-founder and Editor at GreatGameIndia, a quarterly journal on geopolitics and international affairs. He can be reached at shelley.kasli@greatgameindia.com

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