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म्यामार में बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष का दौर जारी है| इस संघर्ष में म्यामार सरकार को सेना और पुलिस का सहारा लेना पड़ा, इस कारवाई में तमाम तरह की ज्यादतियों की भी खबरें आ रही हैं| लेकिन ये मामला महज इतना ही नहीं, स्पुतनिक इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें दुनिया के तमाम बड़े खिलाडियों का भी बहुत कुछ दांव पर है|

प्रमुख रुसी मीडिया आरटी ने रशियन अकादमी ऑफ़ साइंसेज के इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएण्टल स्टडीज में सेंटर फॉर साउथ एशिया, ऑस्ट्रेलिया एंड ओशिनिया के डायरेक्टर दमित्री मोस्यकोव की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि “बाहरी दुनिया के खिलाडियों की इस हवाबाजी” के कम से “कम तीन आयाम हैं”

मोस्यकोव आरटी को बताते हैं कि “पहला तो यह खेल चीन विरोधी है, क्योंकि चीन ने अराकान (रखाइन) में भारी निवेश कर रखा है”, दूसरा मकसद है दक्षिण पूर्वी एशिया में मुस्लिम चरमपंथ को उर्जा देना… तीसरा यह आसियान देशों (म्यामार और दक्षिणपूर्व मुस्लिम बाहुल्य इंडोनेशिया और मलेशिया) के बीच आपसी कलह के बीज बोने की कोशिश है”

इस संघर्ष का केंद्र है म्यामार के उत्तर पश्चिम का रखाईन स्टेट जहां भूगर्भ ईंधन के विशाल भंडार मौजूद है| मोस्यकोंव के मुताबिक बाहरी खिलाडियों की दखल की बड़ी वजह भूगर्भ ईंधन का यह विशाल भंडार ही है, जिसके लिए वे संघर्ष करवा रहे है जिससे दक्षिणपूर्वी एशिया में अस्थिरता पैदा हो गयी है|

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मोस्य्कोव ने बताया कि वहां एक बहुत बड़ा प्राकृतिक गैस का क्षेत्र है जिसका नाम है थान श्वे, यह गैस क्षेत्र उस जनरल के नाम पर है जिसका बर्मा में लम्बा शासन रहा|

रखाईन के उर्जा भंडार वाले क्षेत्र की खोज वर्ष 2004 में हुई और वर्ष 2013 तक चीन ने म्यामार के क्यौक्फ्यु बंदरगाह से अपने यूनान प्रान्त के कुनमिंग शहर तक तेल और प्राकृतिक गैस की पाइपलाइन बिछा ली| अगर बर्मा के तटीय क्षेत्रों पर की गैस का परिवहन इस पाइप लाइन से चीन को गैस पहुँचती है तो चीन मालक्का स्ट्रेट्स को दरकिनार कर सकता है, जो कि समुद्री यातायात का सबसे ज्यादा व्यस्त पड़ाव है|

यह भी एक संयोग है कि चीन-म्यामार के बीच इस प्रोजेक्ट के साथ-साथ रोहिंग्या का संघर्ष भी तेज हुआ है| इस खूनी संघर्ष के चलते में वर्ष 2011-12 में 120000 लोगों को देश छोड़कर शरणार्थी होना पड़ा|

रूस के पीपल’स फ्रेंडशिप यूनिवर्सिटी में इंस्टीटयूट ऑफ़ स्ट्रेटेजिक स्टडीज एंड प्रोग्नोसिस के डिप्टी डायरेक्टर दमित्री एगोर्चेनकोव मानते हैं कि यह महज एक संयोग नहीं| हालाँकि रोहिंग्या संघर्ष के तमाम आतंरिक कारण भी हैं लेकिन दमित्री को विश्वास है कि इसमें भी बाहरी ताकतों की भूमिका जरुर होगी, जिनमे से गौरतलब है जॉर्ज सोरोस|

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म्यामार को अस्थिर करने के साथ-साथ वे चीन के उर्जा प्रोजेक्ट को सीधे निशाना बना सकते हैं| जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्तपोषित बर्मा टास्क फ़ोर्स म्यामार में वर्ष 2013 से सक्रिय है, जबकि जॉर्ज सोरोस की म्यामार के घरेलू मामलों में दखल उससे कहीं ज्यादा गहरी है|

वर्ष 2003 में जॉर्ज सोरोस युएस टास्क फ़ोर्स समूह से जुड़े जिसका मकसद था “अमेरिका और दूसरे देशों के सहयोग से म्यामार के पहुप्रतीक्षित राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक कायाकल्प करना”|

“बर्मा: टाइम फॉर चेंज” नाम से काउंसिल ऑफ़ फॉरेन रिलेशन द्वारा जारी किये गए एक दस्तावेज में उल्लेख मिलता है कि “अमेरिका और अन्तराष्ट्रीय समुदाय के सहयोग के बगैर बर्मा में लोकतंत्र का बचे रहना संभव नहीं”| इसी दस्तावेज में प्रोजेक्ट के जारी रखने के लिए ऐसे समूह की स्थापना का भी जिक्र मिलता है|

एगोर्चेन्कोव आरटी को बताते हैं कि “जब जॉर्ज सोरोस किसी भी देश में जाते हैं तो वे मजहबी, नस्ली या सामाजिक विरोधाभासों को देखकर इन्ही विकल्पों के जोड़-तोड़ से वे अपनी कारसाजी का रुख तय करते हैं और उन मुद्दों को गरमाने का प्रयास करते हैं”|

मोस्यकोव के मुताबिक यह ग्लोबलिस्टों की एक मैनेजमेंट पालिसी है जिसके तहत वो क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ावा देकर देशों के बीच आपसी कलह के बीज बोते हैं, जिससे उनको पीड़ित देशों पर दबाव बनाने का मौका मिलता है और अंततः उन्ही देशों की संप्रभुता पर नियंत्रण का मौका मिल जाता है| इससे पहले हुई ऐसी घटनाओं में ग्रीक और यूक्रेन के उदहारण सामने हैं| इस तरह जब आग की लपटें उठती हैं और देश संकटों से घिरा होता है तो यह गिद्धों के नीचे उतरने का समय होता है|

“खरीदो तब जब सडकों पर खून हो, चाहे यह तुम्हारा अपना ही खून क्यों न हो”|
ये शब्द हैं रोथ्सचाइल्ड घराने के नाथन मायेर रोथ्सचाइल्ड के, जो कि ईस्ट इण्डिया कंपनियों को चलाने वाले घरानों में से एक है|

यह समझे जाना चाहिए कि ऐसे संकट सिर्फ मूलभूत व्यवस्थाओं और मानव जीवन भर ही नहीं बल्कि इनसे अर्थव्यवस्था भी तहस नहस हो जाती है और देश भारी कर्जे में पड़ जाता है| और अगर इसमें सुधार न किया गया तो इसी कर्जे की बदौलत ग्लोबलिस्ट खिलाडी लोग दशकों और शताब्दियों तक संप्रभु देशों पर अपनी तानाशाही शर्ते लगाते हैं| यही वजह है कि उक्रेन और ग्रीस ने रोथ्सचाइल्ड को बढ़ते कर्ज संकट के लिए अपना कर्ज सलाहकार बनाया|

भारत के लिए सबक

नोटबंदी पर विशेष लेखों में (जैसा कि हमने War on Cash में समझाया) हमने बताया कि भारत भी 1.14 लाख करोड़ के घोटाले में फंसे हुए उन कर्जों के संकट के लिए समाधान तलाश रहा है| इसके लिए एक समाधान हमारे रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सुझाया है| उनका सीधा सुझाव है कि सरकारी संपत्तियों को उन विदेशी खिलाडियों को बेच दिया जाये जो 2008 के आर्थिक संकट में दीवालिया हो गए थे| आप इसके बारे में यहां सब कुछ पढ़ सकते हैं – पैरा – भारत की सामरिक बिक्री के लिए एक नया सेंट्रल बैंक|

अगर हालात बिगड़ते हैं और चीन और म्यामार के बीच युद्ध भी होता है तो भी धन कुबेरों का कुछ नहीं बिगड़ता है, और वास्तव में इससे उनको फायदा ही होना है, बिलकुल वैसे ही जैसा उन्हें रूस-उक्रेन के संघर्ष में मिला| पढ़े लिखे लोग इसे बैलेंस ऑफ़ पॉवर कहते हैं| बैलेंस ऑफ़ पॉवर की इसी रणनीति के तहत आजकल भारत-चीन विवादों को हवा दी जा रही है| लेकिन हमे कर्ज लेकर युद्द के भरोसे रहने की जरूरत नहीं, यह काम हमारे नीति नियंता बखूबी कर रहे हैं| हमारे देश में कृषि, अर्थव्यवस्था, नागरिक समाज और प्रेस और बाहरी और गृह सुरक्षा के अपने संकट हैं| यह हमारे नीति नियंताओं के बनाये रस्ते हैं जिसमे अगर सुधार नहीं किया गया तो आगे भयंकर तबाही है|

क्या ऐसा संकट भारत पर भी पड़ सकता है?

यह एक काल्पनिक प्रश्न है जो हमने तब उठाया जब शराब माफिया विजय माल्या को देश छोड़ कर लन्दन भागने दिया गया| ऐसा पहली मर्तबा नहीं हुआ है जब कोई आदमी देश के कानून को दरकिनार करके विदेश भागा हो और उसे लन्दन में जगह मिली हो| दशकों से तमाम हाई प्रोफाइल अपराधी और अकूत सम्पदा के मालिक ब्रिटेन भागते रहे हैं जहाँ उन्हें सुकून की जिंदगी मिलने के साथ साथ उनकी काली कमाई को भी ठिकाने लगाने की सहूलियत मिल जाती है|

रूस का मामला भी ऐसा ही है| सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां भी बड़े पैमाने पर देश की संपत्तियों का निजीकरण हुआ| यह सब हुआ ईस्ट इण्डिया कंपनियों के गुलाम बनाने के औजार ग्लासनोस्त एंड पेरेस्त्रोइका यानि वैश्वीकरण अर्थात उदारीकरण और निजीकरण से| उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया में वहां भी बड़े बड़े व्यापारिक घराने बने जिन्होंने देश की संपत्तियों को कौड़ियों के भाव खरीदकर अकूत सम्पदा बनाई|

सत्ता में आने के बाद वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को बड़े पैमाने पर इन सभी व्यापारिक घरानों को ठिकाने लगाना पड़ा, रूस में यह सत्ता संघर्ष आज भी जारी है| वहां का  सबसे प्रसिद्ध मामला है मिखाइल खोदोर्कोव्स्की का| उसने साइबेरिया के तेल के क्षेत्रों का युकोस नाम से एकीकरण किया, इस कंपनी ने देश की संपत्तियों के निजीकरण के बाद नब्बे के दशक में अकूत सम्पदा बनाई, वर्ष 2003 में खोदोर्कोव्स्की को सबसे अमीर आदमी माना जाता था (जिसकी अनुमानित संपत्ति पंद्रह बिलियन डॉलर आंकी गई)| बाद में खोदोर्कोव्स्की को राष्ट्रपति पद के लिए हेनरी किस्सिंजर, जॉर्ज सोरोस और रोथ्सचाइल्ड घरानों का सहयोग मिला जिससे उसने पुतिन के खिलाफ चुनावों में उलटफेर कराने की भरसक कोशिश भी की|

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कालेधन वालो, जालसाजों और विदेशी आतंकियों और चरमपंथियों के लिए यूनाइटेड किंगडम एक परंपरागत अभ्यारण्य साबित हुआ है| कोई भी जो आतंक की दुनिया में अहम् है, उसका पिछला दरवाजा यूनाइटेड किंगडम में है|

भारत के ही 131 भगोड़े अपराधियों के ब्रिटेन से प्रत्यर्पण के मामले लम्बित हैं|

जो अपराधी हिंदुस्तान से फरार हैं और ब्रिटेन में रह रहें हैं उनमे से कुछ लोगों की सूची निम्नलिखित है:

  1. विजय माल्या (आर्थिक अपराधी)
  2. ललित मोदी (आर्थिक अपराधी)
  3. रवि शंकरन ( नेवी वार रूम लीक केस में आरोपी)
  4. टाइगर हनीफ (गुजरात में दो बम विस्फोट,1993 से जुड़ा अपराधी)
  5. नदीम सैफी (गुलशन कुमार की हत्या के मामले में सजायाफ्ता और फरार संगीत निर्देशक)
  6. रेमंड वरली (गोवा में बाल यौन शोषण का आरोपी)
  7. लार्ड सुधीर चौधरी (हथियार सौदे का कुख्यात दलाल जो इतालियन कंसोर्टियम से फिनमेक्कानिका से हेकोप्टर खरीद में बिचौलिया रहा)
  8. खालिस्तान आन्दोलन के कई आरोपी
  9. लिट्टे से जुड़े कई आरोपी
  10. आईएसआईएस से जुड़े कई आरोपी

यहाँ तक कि एमक्यूएम का नेता अल्ताफ हुसैन भी लन्दन में ब्रिटिश सरकार के संरक्षण में रहता है जिसके लिए पाकिस्तान ने प्रत्यर्पण का अनुरोध किया हत्या के एक मामले में मुक़दमे के लिए उसका प्रत्यर्पण ब्रिटेन ने अस्वीकार कर दिया|

पिछले साल सितम्बर में खोदोर्कोव्स्की ने ओपन रसिया (जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्तपोषित एनजीओ) के लन्दन मुख्यालय से कहा उसका संगठन कई विपक्षी पार्टियों और निर्दलीय रूप से मजबूत 230 प्रत्याशियों को चुनाव के लिए संसाधन मुहैया करवाएगा| ब्रिटेन में बसे तमाम भारतीय धनकुबेरों के चलते वह दिन दूर नहीं भारत के धनकुबेर भारत में ही जनआंदोलन या चुनावों में उलटफेर के काम आ जाएँ — भारत को इस मामले में सुधार करने की जरुरत है?

ऐसा हुआ भी तो, संकट टालने और ऐसी परिस्थितियों से निपटने का एक रास्ता है| नब्बे के दशक में जब पुतिन ने उन घरानों को रूस से भगा दिया तो वे गुलाम बनाने के जांचे परखे विचार यानि ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका (इसे भारत में उदारीकरण और निजीकरण कहा जाता है) के साथ अपनी दुकानदारी लेकर भारत पहुंचे| इन व्यापारिक घरानों या कहें कि लुटेरे सामंतों (जिन्हें अमेरिकी रॉबर बैरनस कहते हैं) का कारोबार हिंदुस्तान में आज भी फल-फूल रहा है| इसलिए हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों को विपक्षी दलों की जासूसी करने और सूचनाओं के लिए विदेशी एजेंसियों पर निर्भर होने की बजाए इस काले कारोबार के नेटवर्क की जांच करके हिंदुस्तान को उनकी काली परछाई से आजाद करवाना चाहिए, जैसा कि अमेरिका में हुआ (इसकी कवायद आज भी जारी है)|

शेली कस्ली की रिपोर्ट, राकेश मिश्र विद्यार्थी द्वारा अनुवाद|


India in Cognitive Dissonance Book

For more than 2000 years a war is being waged for the control of India and the access routes connected to it. The Turkey Coup is the beginning of the end of the Great Game, as it is known. With Russia slipping out of their hands, the eyes were set on an unfathomably resource-rich country, which even after thousand years of non-stop plunder and looting still captures the imagination of one and all, thugs, thieves and robber-barons alike with her yet-unknown massive economic resources potential — that country is India.

India in Cognitive Dissonance is a hard-hitting myth-buster from GreatGameIndiaA timely reminder for the decadent Indian society; a masterpiece on Geopolitics and International Relations from an Indian perspective – it lays bare the hypocrisy taken root in the Indian psyche because of the falsehoods that Indian society has come to accept as eternal truth.

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