Read this report in English – Nirav Modi & The Smuggling Of National Treasure

“किंगफिशर ग्रुप के विजय माल्या, बंगलौर, सहारा ग्रुप के सुब्रत रॉय, कलकत्ता या सत्यम ग्रुप, हैदराबाद के रामलिंगराजू की तरह ही एक बहुत बड़ा वित्तीय घोटाला मैं आपके ध्यान में लाना चाहूँगा… इससे पहले की बहुत देर हो जाए और ये लोग भी विजय माल्या की ही भांति देश छोड़ कर भाग जाएँ, कृपया इस पर गौर करें!” यह बंगलुरु स्थित कारोबारी हरी प्रसाद ने लिखा था, जिन्होंने गीतांजलि जेम्स द्वारा 10 करोड़ रुपये के लिए ठग लिए जाने के बाद 2015 में मेहुल चोकसी और उनकी समूह की कंपनियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत बंगलुरु पुलिस मे दर्ज कराई थी। जिसके बाद उन्होंने कई अथॉरिटीज जैसे एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED), सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI), सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI), कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और यहाँ तक की PMO को भी अगले साल जुलाई 2016 में लिखा था।

इन सभी पूर्व चेतावनियों के बावजूद, नीरव मोदी अपने भाई निशाल, एक बेल्जियम नागरिक और अपनी पत्नी एमी, एक अमेरिकी नागरिक के साथ 1 जनवरी 2018 को और उनका व्यापारिक साझीदार और गीतांजलि जेम्स का भारतीय प्रमोटर मेहुल चोकसी 6 जनवरी को भारत छोड़ने में कामयाब रहे, 29 जनवरी को सीबीआई द्वारा 280 करोड़ के धोखाधड़ी के केश दर्ज करने के बहुत पहले ही, जिसमे अब भारतीय बैंकों का 20,000 करोड़ रुपये तक का निवेश होने का संदेह है।

पीएनबी के मुताबिक, उनके “कनिष्ठ स्तर के शाखा अधिकारी” ने अन्य बैंकों की विदेशी शाखाओं को निर्देश दिए थे कि पंजाब नेशनल बैंक ने इन कंपनियों की तरफ से LOU जारी किया था। ये निर्देश वैश्विक वित्तीय संदेश सेवा SWIFT के माध्यम से भेजे गए थे, जो पीएनबी के कोर बैंकिंग सॉफ्टवेयर इन्फोसिस के फिनाकल में लॉग-इन नहीं हुए थे।

हालांकि धोखाधड़ी के बेहतर विवरण अब भी विभिन्न एजेंसियों द्वारा जांच किये जा रहे है, परन्तु यह सूरत और मुंबई के गुजराती लोगों के बीच एक आम धारणा है जो विशिष्ट स्थापित डायमंड डीलरों द्वारा अक्सर ठग लिए जाने के बाद अब उनकी धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली से परिचित हैं। आमतौर पर यह ऐसे काम करता है – स्थापित हीरा व्यापारी की छवि को पेश कर, किसी नए उद्यम के लिए बैंकों से (आमतौर पर बैंक अधिकारी को रिश्वत देकर) और स्थानीय व्यापारियों या इच्छुक पार्टियों से ऋण प्राप्त किया जाता है। यह ऋण आम तौर पर व्यापारी या उसके व्यवसाय के नाम पर नहीं, अपितु किसी रिश्तेदार के नाम से लिया जाता है।

जब बैंक ऋण वापस लेने आती है या उधारकर्ता विरोध करना आरम्भ करते हैं, रिश्तेदार खुद को दिवालिया घोषित कर देते हैं और परिवार उस व्यक्ति को अपने से अलग कर देता है। छोटी धोखेबाजी तो स्थानीय समाचार पत्रों तक ही सीमित रह जाती है परन्तु बड़ी धोखाधरियों में जब मामला तुल पकड़ने लगती है तो साधारणतया व्यक्ति भारत छोड़कर अपने परिवार के पास बेल्जियम चला जाता है। क्या नीरव मोदी, मेहुल चौकसी का मामला ऐसा नही था, जो की अम्बानी परिवार से और विन्जोम डायमंड्स और रोटोमैक, दोनों के मालिक जतिन मेहता और विक्रम कोठारी अदानी से संबंधित हैं?

धोखाधड़ी द्वारा हासिल किया गया यह पैसा शेल कंपनियों के माध्यम से या इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) क्रिकेट टीमों की नीलामी (जो कि सिर्फ एक काले धन को वैध बनाने वाला औजार बन गया है) जैसी अभिनव योजनाओं के माध्यम से जैसा की ललित मोदी मामला या पूर्व बाएं हाथ का गेंदबाज बिशन सिंह बेदी और कुछ अन्य मामलों से प्रदर्शित हुआ है। इन हीरा व्यापारियों का गठजोड़ और उनकी ताकत का उजागड़ आईपीएल कोच्ची विवाद 2010 के दौरान हुआ था जिसकी एक शिकार सुनंदा पुष्कर हुई थी। टीम कोच्ची का वित्त पोषण मुख्य तौर पर मुंबई, दुबई और बेल्जियम स्थित गुजराती हीरा व्यापारियों ने किया था, परन्तु टीम का स्वामित्व रेनडेवस स्पोर्ट्स वर्ल्ड के सीईओ, शैलेंद्र गायकवाड़ और इनके छोटे भाई, रवि गायकवाड को (जो तभी महाराष्ट्र में उप क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी भी थे) प्राप्त हुआ था।

आईपीएल कोच्ची टीम के बहु करोरी स्वामित्व हासिल करने वाले दिन से गायकवाड बंधुओं पर स्वामित्व छोड़ देने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। परन्तु गायकवाड़ बंधू नही टूटे, अडिग रहे। तब और गड़बड़ हो गयी जब रेंदेवस स्पोर्ट्स वर्ल्ड (RSW) ने प्रवक्ता सत्यजीत गायकवाड़ के माध्यम से बोलना शुरू कर दिया कि ललित मोदी कोच्चि टीम को हथियाने की कोशिश कर रहे थे (यहाँ तक की 50 मिलियन डॉलर की पेशकश तक की गयी) ताकि उन्हें IPL से बाहर निकाला दिया जाए और टीम का स्लॉट गुजरात के मुख्यमंत्री के हाथों सौंप दिया जाए।

तब के IPL आयुक्त ललित मोदी के अनुसार, वे शशि थरूर थे जिन्होंने कंसोर्टियम का आयोजन करने में सहयोग किया था, जिसमे  कोच्चि फ्रेंचाइजी के लिए 333.33 मिलियन डॉलर की बोली लगाई गयी थी और यह भी खुलासा किया कि निवेश समूह में एक व्यक्ति सुनंदा पुष्कर भी थी, जिन्हें बिना कोई निवेश के 15 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी दी गयी थी। सुनंदा पुष्कर के कोच्ची फ्रैंचाइज़ी के शेयर छोड़ने वाले दिन ही शशि थरूर ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया था। अंततः सत्यजित को हटा दिया गया और रोज़ी ब्लू डायमंड के के. तहिलरामनी को उनके स्थान पर प्रस्थापित कर दिया गया, और साथ ही हर्षद मेहता, शैलेंद्र गायकवाड़ की जगह कोच्ची फ्रैंचाइज़ी के अध्यक्ष बन गए। जब सुनंदा ने हीरे के डीलरों की इस गठजोड़ के बारे में मीडिया में इशारा करना शुरू किया तो आखिरकार जीवन गँवा बैठी।

ये मनी लॉन्डरिंग की गतिविधियां सिर्फ IPL तक सीमित नहीं हैं लेकिन इसमें बॉलीवुड फिल्मों का निर्माण, राष्ट्रीय संसाधनों की तस्करी और यहां तक कि चुनावों में हेराफेरी भी शामिल है। इस तरह के हीरे की तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग गतिविधियों के लिए भारतीय हीरा व्यापारियों को चीनी अधिकारी अक्सर गिरफ्तार करते है और 2013 में तो उनको जेल भी भेज दिया। उनके बाहर निकलने की कहानी अद्भुत है, जिसे हम अपने पाठकों को जांचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और साथ ही उनके अन्य साहसिक कारनामों को भी।

नीरव मोदी से डायमंड बॉय की उल्कात्मक वृद्धि की एक बहुत ही सुन्दर कहानी है जो कि क्रिस्टी और सोथबी के नीलामी घरों से शुरू होती है। प्रसिद्धि के लिए उनका दावा तब आया जब हांगकांग में नीलामी में 16.29 करोड़ रुपए की कमाई वाले गोलकॉन्डा हीरे के हार के लिए 2010 में क्रिस्टी की नीलामी सूची में शामिल होने वाले नीरव मोदी पहले भारतीय बने। उसके बाद अक्टूबर 2012 में, उनके रिव्एरे डायमंड का हार हांगकांग में सोथबी की नीलामी में 33.14 करोड़ रूपए में बेचा गया था, जिसके बाद 2013 में उन्होंने फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में अपनी जगह बनाई – दोनों ही आइटम उन्हें बेचे गए थे जो अपनी पहचान उजागर नही करना चाहते थे। यह अंतर्राष्ट्रीय डायमंड बॉय का व्यक्तित्व, पुरानी हिरा घसु जादुई करिश्मा की भांति, भारतीय बैंकों से हजारों करोड़ का ऋण लेने के लिए पर्याप्त था।

हालांकि भारतीय जांच एजेंसियों ने बाजार में छेड़छाड़, रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों से इस सुनहरी कहानी की हवा निकाल दी थी। 2013 में, SEBI ने एक जांच में गीतांजली जेम्स लिमिटेड को बाज़ार में हेरफेर में शामिल पाए जाने पर चौकसी और अन्य 24 कंपनियों को प्रतिबंधित कर दिया, जिसके बाद कंपनी कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन के तहत 5,000 करोड़ रुपये की सेवा ऋण लेने में असफल रही। राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) द्वारा की गई जांच के अनुसार इन ऋणों को सुरक्षित करने के लिए उनकी खाता पुस्तकों में तैयार किए गए आंकड़ों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया था। जांच के बाद DRI ने उसकी कंपनियों को मुख्य रूप से स्टार डायमंड इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड, रेडाशिर ज्वेलरी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और फायरस्टार इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को 37.16 करोड़ रुपये की ड्यूटी के रूप में, 5.84 करोड़ रुपये की ब्याज 15% की दर से और 5.57 करोड़ दंड के रूप में- कूल 48.22 करोड़ रुपये वसूला।

ज्यादातर लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि यह सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि कई घोटालों का एक जाला है – इनके जीने का एक तरीका है। इस बिंदु को बेहतर ढंग से समझाने के लिए हम उनके साहसिक कार्यों में से एक का जिक्र करते हैं। 2012 में, तेंडाई बिट्टी, तत्कालीन वित्त मंत्री जिम्बाब्वे ने खुलासा किया था कि उनकी खनिज विकास एजेंसियों द्वारा एकत्रित 300 मिलियन डॉलर राज्य को सौंपे नहीं गए। इस बीच, 2.5 मिलियन कैरेट हीरे का भंडार, अनुमानतह 200 मिलियन अमरीकी डॉलर के मूल्य का अचानक से गायब हो गया। आगे के अध्ययन ने निष्कर्ष निकला कि सबसे अवैध राजस्व “अत्याधुनिक कीमत हेरफेर योजना” के माध्यम से उठाया गया था जिसमें हरेरे में कानूनी निगरानी प्रणाली के भीतर हीरों को गिरी हुई कीमत पर बेचा गया था, फिर दोबारा उन्ही हीरों को मूल कीमत से दोगुने मूल्य पर दुबई और भारत के व्यापार केंद्रों में दोबारा बेच दिया गया। इन सबमे ज़िम्बाब्वे को 2 अरब डॉलर खोना पड़ा। यह आश्चर्यजनक उपलब्धि, भारतीय हीरा व्यापारियों ने अपने ज़िम्बाब्वे के सहयोगियों के सहयोग से हासिल किया, जिसकी आय प्रसिद्ध तानाशाह रॉबर्ट मुगाबे के प्रति वफादार ‘समानांतर सरकार’ को गई थी।

इस तरह के प्राकृतिक संसाधन, इस मामले में माइंडवाश्ड गुलाम बच्चों की सेना द्वारा ब्लड डायमंड का खनन जो हीरा व्यापारियों द्वारा विभिन्न माध्यमों से ठग लिया जाता है, आमतौर पर विश्व प्रसिद्ध नीलामी घरों में जा पहुंचता है। ऐसे नीलामी घरों में दो क्रिस्टी और सोथबी हैं जहां नीरव मोदी के तराशे गए हीरे नीलाम किये गए थे, जिससे उसके करियर को नई उंचाई मिली। अधिकतर भारतियों को ये सब ज्ञात नही है क्योंकि मीडिया ने कभी इसे रिपोर्ट नही किया, मीडिया ने रिपोर्ट करने में रुचि इसलिए नही दिखाई क्योंकि ये सारे नीलामी घर ब्रिटिश उपनिवेश की विरासतों को लूटकर यूरोपीय संभ्रांतो को बेचने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा स्थापित किये गए थे।

जेम्स क्रिस्टी ने 5 नवंबर 1766 को पॉल मॉल, लंदन के कमरे में अपनी पहली नीलामी आयोजित की थी, जहां भारत, चीन, जापान और तुर्की से विभिन्न वस्तुओं की नीलामी हुई थी। क्रिस्टी की इस नीलामी में विभिन्न वस्तुओं में विश्व प्रसिद्ध अवशेष, दुर्लभ हीरे, चोरी की प्राचीन वस्तुएं और मंदिर की मूर्तियां, पांडुलिपियां और अन्य ऐसी ही कलाकृतियों शामिल थी। हालांकि ये सब वस्तुवें ही नही बल्कि क्रिस्टी ने भारतीय सडकों पर अंग्रजी महिलाओं को बेचने का भी सौभाग्य प्राप्त किया। इस तथ्य को एक प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिक रचनाकार जेम्स गिलरे ने अपने हस्त रचित नक्काशी “ईस्ट इंडीज में अंग्रेज़ी-सुंदरियों की बिक्री” में उद्धृत किया है।

‘A sale of English-beauties, in the East Indies’ by James Gillray, published by William Holland hand-coloured etching and aquatint, published 16 May 1786. © National Portrait Gallery, London

उपर्युक्त चित्र में प्रदर्शित किया गया है की अंग्रेजी वेश्याओं से भरे हुए जहाज को किस प्रकार कोल्कता की सड़को पर छिछोरे नीलाम करता द्वारा बेचा जा रहा है। केंद्र में एक महिला है जिसका दाहिना हाथ भारतीय निरीक्षक ने पकड़ रखा है और बायाँ हाथ अंग्रेजी विक्रेता ने, और सर के ऊपर एक अश्वेत छोटे लड़के ने छाता लगा रखा है। अंग्रेज की जेब से बाहर आने वाले पेपर पर ‘गवर्नर जनरल के लिए निर्देश’ अंकित हैं। दाहिनी ओर एक महिला को ‘पैसो की कमी’ नामक एक बैरल के विपरीत तराजू पर तौला जा रहा है। दाहिने ओर गोदाम के दरवाजे पर बहुत सारी महिलायें रो रही हैं। दरवाजे पर “यूरोप से अविक्रेय माल का गोदाम” अंकित है। प्रिंट में अन्य दिलचस्प विवरणों को देखने के लिए हम पाठकों को प्रोत्साहित करते हैं।

जेम्स क्रिस्टी ने बंगाल की लूट को बेचकर अपना भाग्य बनाया जिसकी कमाई से आज की दुनिया के प्रसिद्ध नीलामी घरों की नींव रखी गयी। रॉबर्ट क्लाइव के पलासी जीत लेने के बाद, मीर जाफर को “कठपुतली नवाब” के रूप में स्थापित किया गया, और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने कर्तव्यनिष्ठ भाव से राज्य के खजाने को खाली कर दिया। अभियानों की एक श्रृंखला में, क्लाइव ने बड़े पैमाने पर खजाने से भरे भंडारगृहों को लूट लिया जिसे अब प्लासी लूट के रूप में जाना जाता है। इसने राज्य के खजाने को पूरी तरह से खाली कर दिया जिससे बंगाल की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो गई। उपनिवेशो का प्रयोग मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के प्रभावों को समझने के लिये किया गया, जिसका परिणाम बृहद बंगाल अकाल 1770 के रूप में सामने आया जिससे प्रभावित क्षेत्रों की एक तिहाई आबादी भूखे मर गयी।

क्या आप जानते हैं कि भारत में रॉबर्ट क्लाइव द्वारा लूटी गए इन वस्तुओं में से कुछ हाल ही में 2004 में लंदन में क्रिस्टी नीलामी घर में नीलाम कि गयी? जब क्लाइव के नाती-पोते को पैसे की कमी हुई तो उनलोगों ने लूट में से कुछ चीजें क्रिस्टी की नीलामी में बेच दि, जिससे उन्हें £ 4 मिलियन मिले। अभी भी उनके पास भारतीय खजानों से भरे हुए गोदाम हैं जिस पर क्लाइव परिवार दावा करता है, और जिस तरह से ब्रेक्सित ने ब्रिटेन को अराजकता में धकेल दिया है इन्हें पुनः जेब खर्च के लिए इसे जल्द ही बेचना पड़ेगा।

यहां रॉबर्ट क्लाइव के चोरी के खजाने में से कुछ हैं जो उनके वंशजों द्वारा क्रिस्टी में नीलाम कि गए:

  • A fly whisk of bent agate studded with rubies – £901,000
  • A unique dagger adorned with jewelled floral sprays – £733,000
  • A hookah with blue enamel and sapphires –  £94,000
  • A pale green nephrite jade bowl-  £53,000
  • A jade flask intricately decorated in bands of emeralds and studded with ruby flowers, all set in gold.

इन वस्तुओं को कतर के कला और विरासत मंत्री, शेख सऊद बिन मोहम्मद अल-थानी द्वारा खरीदा गया था। कथित तौर पर इस सौदे ने ब्रिटिश अधिकारियों से उनका टकराव स्थापित किया और डीलरों के अनुसार,”सत्ता में बहुत सारे लोग इनके कार्यकलापों को पसंद नही करते थे।“ ऐसा कहा जाता है की उन्हें उनके लन्दन के एक घर में ही नजरबन्द कर लिया गया था जहाँ रहस्यमय तरीके से उनकी मृत्यु हो गयी, परिणामस्वरूप यह चीजें अभी भी नीलामी के लिए हैं।

India Today Magazine, June 30, 2003 Issue

यह सिर्फ एक ऐसे ईस्ट इंडिया कंपनी अधिकारी की कहानी है, जो की मात्र एक क्लर्क था, जिसे इतिहासकार “एक अस्थिर मनोरोगी” बताते है। ऐसे अन्य उच्च अधिकारियों के बारे में क्या? क्या भारत सरकार उपनिवेशवादियों द्वारा लूटे गए खजाने की मात्रा जानती है? अगर नहीं, तो आजादी के बाद क्या किसी भी भारतीय सरकार ने इस लूटे गए खजाने की एक सूची को संकलित करने हेतु अध्ययन शुरू किया? यह अभी तक क्यों नहीं किया गया है?

यह सिर्फ औपनिवेशिक युग की लूट नहीं है जो क्रिस्टी और सोथबी के नीलाम घरों मे में नीलाम किया जा रहा है। आज भी वे भारतीय प्राचीन वस्तुओं और कलाकृतियों की तस्करी में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। कुछ साल पहले जांच में सोथबी और भारतीय एंटीक तस्कर वामन घिया के बीच एक उच्च-प्रोफ़ाइल नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ था। घिया, आर्ट डीलरों और नीलाम घरों से जुड़े एक वैश्विक रैकेट का हिस्सा था। 2003 में राजस्थान पुलिस ने एक खोज के दौरान, सोथबी और क्रिस्टी के 68 कैटलागों को बरामद किया था। एक गवाह ने जांचकर्ताओं को बताया कि उसने विदेशों में निर्यात के लिए हजारों प्राचीन मूर्तियां पैक की थी, जिनमें से कुछ कैटलॉग में दिखायी गयी थी।

2001 में एक अंतर्राष्ट्रीय मूल्य-निर्धारण फिक्सिंग साजिश में मैनहट्टन के US डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने सोथबी होल्डिंग्स इंक्लूसिव के पूर्व चेयरमैन और क्रिस्टी इंटरनेशनल पीएलसी को दोषी ठहराया – ये दुनिया के दो सबसे बड़े नीलाम घर हैं जिनका विश्व के 90 प्रतिशत से अधिक नीलामीयों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण है। हम अभी तक भारत सरकार द्वारा इन नीलाम घरों के विरुद्ध किसी ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो सदियों से बड़े पैमाने पर हमारी संस्कृतियों की तश्करी कर रहे हैं, जो अब 5 अरब डॉलर का काला बाजार बन गया है। भारत सरकार को चीनियों से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने अपनी संस्कृति के इस प्रकार बेचे जाने पर सख्त कदम उठाये है।

रॉबर्ट क्लाइव के बंगाल पर कब्ज़ा करने के बाद, ब्रिटिशों ने खेतों में केवल अफ़ीम पैदा करने के लिए भारतीय किसानों को मजबूर किया और उनके द्वारा उगाई गई अन्य फसलों को जब्त कर लिया। भारतीय मिट्टी पर उगाया गया यह अफ़ीम कुछ भारतीय व्यवसायियों के सहयोग से चीन की ओर बढ़ने लगा, जिन्होंने अपना साम्राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए ड्रग्स बेचकर खड़ा किया – उनमे से कई घराने आज भारत में सम्मानित घराने हैं। चीनी बंदरगाहों से शुरू मादक पदार्थों की लत सीधे सम्राट के सैन्य अधिकारियों तक फैलायी गयी – एक शताब्दी के भीतर ही सफलतापूर्वक चीनी युवाओं की पूरी पीढ़ी को ड्रग्स का आदि बनाया गया। जब 1839 में दोगुआंग सम्राट ने चीनी संस्कृति के इस विनाश के खिलाफ लड़ाई लड़ी, तो ब्रिटिश रॉयल नेवी और ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती भारतीय सैनिकों द्वारा समर्थित ईस्ट इंडिया कम्पनी ने चीन पर पूर्ण पैमाने पर युद्ध छेड़ दिया। यह भारत-चीन संघर्ष की जड़ है जिसे हमारे अनुसंधान रिपोर्ट भारत में नरको-आतंकवाद का इतिहास में गहराई से समझाया गया है।

सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज द्वारा चित्रित इस पत्रक में, एक ब्रिटिश सैनिक एक गरीब भारतीय किसान के कपास के खेतों को जलाते हुए दिखाया गया है। किसान को अपने हाथों पर किसी भी उंगलियों के बिना दर्शाया गया है। इसके अलावा, उन्होंने उपकरण नष्ट कर दिए जिसकी सहायता से परिवार सूती कपडे बनाता था। यह भारतियों को एक बार पुनः याद दिलाने हेतु था की किस प्रकार अंग्रेजों ने बलपूर्वक भारतीय सूती कारखानों को तबाह किया – सस्ते अंग्रेजी कपडे खरीदने के लिए। तस्वीर पर यह हिंदी और बंगाली में लिखा है: “ब्रिटिश अत्याचारों का एक नमूना, अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ब्रिटिशों ने ऐसे जंगली अत्याचार किये। भारतीय श्रमिकों को अपनी उंगलियों काटकर अपनी आजीविका खोनी पड़ी।”

युद्ध की इन श्रृंखलाओं को अफीम युद्धों के रूप में जाना जाता है और इसके परिणामस्वरूप हांगकांग को ब्रिटिश द्वारा छीन लिया गया था, जहां उन्होंने लूटे हुए चीनी धन के विभाजन और रख रखाव के लिए विभिन्न संगठनात्मक ढांचा तैयार किया। लंदन मुख्यालय स्थित नीलामी घर, क्रिस्टी और सोथबी के हांगकांग की शाखा इन विस्तृत उद्यमों का हिस्सा हैं। भारतीयों के विपरीत, चीनीयों को अपना इतिहास याद है और उन संदर्भों के बारे में सचेत रहते हैं जिस कारन आज विभिन्न घटनाएँ घट रही हैं, जो उनकी राष्ट्रीय नीतियों में प्रतिबिंबित होती हैं।

अक्टूबर 1860 में, द्वितीय अफ़ीम युद्ध के दौरान, फ्रांसीसी और ब्रिटिश सैनिकों ने ग्रीष्मकालीन महल – चीनी शाही परिवार का घर बीजिंग में – झीलों, उद्यानों और महलों के विशाल संग्रह को लूट लिया। राजमहल को धराशायी करने का आदेश चीन के ब्रिटिश उच्चायुक्त लॉर्ड एल्गिन ने दिया था। यह घटना चीन की औपनिवेशिक अधीनता के लंबे समय के सबसे अपमानजनक क्षणों में से एक है, जो चीनियों को आज भी भावनात्मक कर देता है। हमले के दौरान, जल घडी बनाने हेतु मानव शरीर की मूर्तियों के ऊपर बैठे कांस्य सर के 12 टुकड़े जो की चीनी राशि चक्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, लूट लिए गए। और हाल ही में 2007 में इन में से एक घोड़े के सिर को सोथबी के हांगकांग में नीलामी के लिए रखा गया था।

इस दिनदहाड़े चल रही डकैति से चीनी दशकों से जूझ रहे हैं। नीलामी के जवाब में, पेरिस स्थित वास्तुकार और महल के बागानों के पुनर्निर्माण पर सलाहकार चिउ चे बिंग ने कहा, “ग्रीष्मकालीन महल से सभी चीजों को वापस लाओ, यह एक प्रकार का बदला है, अपमान का बदला लेने का एक तरीका है।” मकाऊ कैसीनो के टाइकून स्टेनली हो ने इस कांसे के घोड़े का सिर 8.84 मिलियन डॉलर में खरीदा और इसे चीन को दान दिया। हो ने 2003 में न्यूयॉर्क के कलेक्टर से सुअर भी खरीदा और उसे भी चीन को दान दिया। यह अब पॉली ग्रुप संग्रहालय में है, चीन पॉली समूह, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से जुड़े हथियार डीलरों द्वारा चलाया जाता है, जिन्होंने 2000 में बैल, शेर और बंदर भी खरीदा था और अब जिन्हें बीजिंग संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाता है।

2009 में, पेरिस में क्रिस्टी द्वारा नीलामी में दो मूर्तियां, एक खरगोश और एक चूहे की थीं जो की मूल रूप से 12 ब्रॉन्ज़ फाउंटेनहेड्स के सेट की ही थी। विभिन्न मालिकों के उत्तराधिकार से गुजरने के बाद, ये मूर्तियाँ फैशन डिजाइनर यवेस सैंट लॉरेंट के संग्रह में आकर रुकी। कड़े चीनी विरोध और एक लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया के बावजूद प्रत्येक सिर की नीलामी 14 मिलियन पाउंड में संपन्न हुई। इस नीलामी ने चीन में भयंकर राष्ट्रवाद को जन्म दिया, यहाँ तक की कुंगफू विशेषज्ञ जैकी चैन ने नीलामी की आलोचना करते हुए कहा, “यह व्यवहार शर्मनाक है, ये अभी भी लूटी हुई वस्तुएं हैं, चाहे जिन्हें भी बेचा गया हो। जो भी उसे चीन से बहार ले गया वो खुद ही एक चोर है। यह कल भी लूट थी और आज भी लूट ही है।”

25 फरवरी 2009 को विवादित 18 वीं शताब्दी का फाउंटेनहेड – एक चूहा और एक खरगोश का सिर – श्री कै मिंगचो द्वारा यवेस सैंट लॉरेंट से 28 मिलियन यूरो में खरीदा गया। कै चीन के राष्ट्रीय खजाने निधि के सलाहकार हैं, जो कि किंग राजवंश के दौरान विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा लुटे हुए खजाने को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं। उन्होंने तब बोली राशि का भुगतान करने से इनकार कर दिया, और दावा किया कि वह नैतिक और देशभक्तिपूर्ण आधार पर बोली लगा रहे थे। चीनी ने क्रिस्टी और सोथबी के नीलामी घरों से बदला लेने की कसम खाई है।

चीन ने, सांस्कृतिक अवशेषों के अंतर्राष्ट्रीय हेराफेरी से लड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अन्य देशों के साथ एक मजबूत खुफिया साझाकरण और संयुक्त जांच सहयोग नेटवर्क बनाया है। चीन और यूरोपीय और कुछ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अन्य देशों से कानून प्रवर्तन एजेंसियां – प्रमुख और व्यक्तिगत मामलों को लक्षित कर रही है और प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए संयुक्त प्रयास कर रही है।

इन नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम, क्रिस्टी को हाल ही में अमेरिकन सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के परिचालकों के रूप में बेनकाब किया गया। जेरी चुन शिंग ली, एक चीनी जासूस है जिसने CIA में घुसपैठ किया था। हांगकांग के क्रिस्टी में एशिया के लिए सुरक्षा के निदेशक के रूप में उसे नियुक्त किया गया था। इस गुप्तचर द्वारा वर्गीकृत शीर्ष गोपनीय जानकारी के माध्यम से, चीनी खुफिया तंत्र ने चीन में CIA की जासूसी को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त कर दिया – जिसे हाल के वर्षों में अमेरिकी सरकार की सबसे बुरी ख़ुफ़िया विफलताओं में से एक माना जाता है।

2017 में, पहली बार, चीन गार्डियन (एक चीनी नीलामी हाउस) ने हांगकांग सम्मेलन और प्रदर्शनी केंद्र में अपनी स्थानीय नीलामी आयोजित की, जिससे क्रिस्टी और सोथबी को धीरे-धीरे बाजार के बाहर धकेला जा सके। संयोग से, चीन संरक्षक  के मालिक, वान चाई सोथबी के सबसे बड़े शेयरधारक हैं।

सोये हुए भारतियों को जगाने और सहयोग हेतु एक खुला संकेत देने के लिए जैकी चैन ने एक दिलचस्प फिल्म बनाया जिसमें भू-पुरातत्व के प्रसिद्ध चीनी प्रोफेसर और  राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान से भारतीय प्रोफेसर द्वारा तिब्बत में भारत के खोये हुए मगध खजाने का पता लगाने का रहस्य शामिल था। इस षड़यंत्र में बड़ी दिलचस्पी से एक 212 कैरेट की चोरी वाली हीरा कलाकृति, जो “शिव की आँख” के रूप में जाना जाता है को दुबई के कालाबाजार में नीलामी करते हुए दिखया गया है।

यह कहानी नीरव मोदी की कहानी से मिलती जुलती है की कैसे नीरव ने उन हीरो को प्राप्त किया जिसने उन्हें दुनियाभर में प्रसिद्धि दिलाई। राष्ट्रीय खजाने को वापस लाने के लिए जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतना कुछ चल रहा है, यह जानकारी बड़ी चतुराई से भारतीय नागरिकों तक पहुंचने से अवरोधित कि जा रही है। यही भारतीय मीडिया जो आज नीरव मोदी को घेर रही है, नीरव मोदी की सफलता की कहानी का बखान करती रही है, पर कभी भी उनके हीरों के स्त्रोत के बारे में पूछना जरूरी नही समझा। द ज्वेलरी एडिटर को दिए गए एक इंटरव्यू में, नीरव मोदी के अनुसार, एक हीरे के डीलर ने उन्हें 2009 में 12.29 कैरेट गोलकुंडा के हीरे के साथ संपर्क किया था – एक पुराना भारतीय हीरा – जिसे पहली बार 1960 के दशक में बेचा गया था।

गोलकोंडा के हीरे वे हीरे हैं जिनका खनन दक्षिण भारत, आज के तेलंगाना और आंध्र-प्रदेश, में हुआ था। भारत की 38 हीरे की खानों में से 23, गोलकुंडा सल्तनत में स्थित थी, जिसने इसे दुनिया की ‘डायमंड कैपिटल’ बना दिया। गोलकोंडा के किसी हीरे का मालिक होना शाशकों के लिए गौरव की बात होती थी। दुनिया के शीर्ष चार गुलाबी हीरे गोलकुंडा से हैं, जिनमें कोहिनूर भी शामिल है। यहां तक कि ये गोलकॉन्डा के हीरे आज भी क्रिस्टी और सोथबी द्वारा बेचे जा रहे हैं। ग्राफ्फ़ पिंक के नाम से जाना जाने वाला एक गोलकुंडा के हीरे को 2010 में सोथबी ने जिनेवा में 44 मिलियन डॉलर में बेचा और 2013 में 34.65 कैरट का एक दूसरा प्रिंस डायमंड सोथबी ने 39.3 मिलियन डोलर में न्यू यॉर्क में बेचा था। क्या भारत सरकार जानती है ऐसे कितने हीरे आज भी क्रिस्टी, सोथबी, विदेशी सरकार या अन्य निजी कलेक्टरों के कब्जे में हैं? ये हीरे वहां कैसे पहुंचे? और नीरव मोदी को बेचा जाने वाला गोलकॉन्डा हीरे के बारे में क्या? यह हीरे गोलकॉन्डा की खानों से अनजान डीलरों के पास कैसे पहुंचे और कैसे उन्हें नीरव मोदी को बेचा गया? क्या यह भी एक संयोग है कि इन हीरों को दुनिया के सबसे बड़े चोरबाजार क्रिस्टी और सोथबी मे बेचा गया? इस पहलू पर मीडिया कवरेज क्यों नहीं है? अगर जैकी चैन  के शब्दों में कहें तो, “”यह व्यवहार शर्मनाक है, ये अभी भी लूटी हुई वस्तुएं हैं, चाहे जिन्हें भी बेचा गया हो। जो भी उसे भारत से बहार ले गया वो खुद ही एक चोर है। यह कल भी लूट थी और आज भी लूट ही है।”

थॉमस पिट, चर्च ऑफ इंग्लैंड के एक पुजारी के घर पैदा हुए एक ईस्ट इंडिया कंपनी अधिकारी की कहानी इस पहलू में जांच शुरू करने का एक अच्छा बिंदु होगा। पिट, जो मद्रास का प्रेसिडेंट बना ने अवैध हीरा व्यापार आरम्भ किया और हीरे की तस्करी से एक विशाल संपत्ति का सर्जन किया। 140.5 कैरेट का बिना कटे हुए हीरे की एक विख्यात कहानी है जिसे लन्दन ले जाने के लिए पिट्ट ने अपने बेटे के जूते में तस्करी की। यह हीरा 135,000 पौंड में फ्रांस के रीजेंट को बेचा गया था, जो अब “ली रीजेन्ट” या “रिजेंट्स डायमंड” के नाम से जाना जाता है। नेपोलियन बोनापार्टने खुद यह हीरा पहनता था और इसे अपनी तलवार की मूठ पर स्थापित किया था।

इस चोरी हुए गोलकुंडा “पिट” डायमंड के अवशेषों से बनी अतिरिक्त पत्थरों को पीटर थे ग्रेट को बेच दिया गया। अठारहवीं शताब्दी तक, गोलकोंडा के हीरे के गहनों से रूस, ईरान, ब्रिटेन, फ्रांस, आस्ट्रिया और बवेरिया के मुकुट सजे थे। अपने जीवन काल में नापोलियन ने एक बार अपने युद्धों का वित्त पोषण करने हेतु इसे गिरवी रखने का भी प्रयास किया था। रीजेंट डायमंड को लूवर, पेरिस में अब प्रदर्शन के लिए रखा गया है, जिसका अनुमानित मूल्य £ 48 मिलियन है। ये सामान्य हीरे नहीं हैं और जैसे ये द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जेट इंजन, उच्च तापमान और उच्च गति वाले हथियार आदि या तेल ड्रिलिंग उद्योग के निर्माण के लिए जरूरी थे, वैसे ही आज भी ये उतने ही आवश्यक हैं। क्या भारत सरकार इन लुटे हुए राष्ट्रीय खजाने को वापस ला सकती है जैसे कि चीन और अन्य देश कर रहे हैं? क्या हमारी राष्ट्रवादी भारतीय नेतृत्व आज भी भारत की विरासत को संरक्षित करने के बारे में चिंतित है?

नदी-जोड़ो परियोजना के तहत, भारत सरकार गोदावरी नदी पर एक विशाल बांध का निर्माण कर रही है, जिसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है। इस क्षेत्र में कई पुरातत्विक स्थल और प्राचीन मंदिर हैं, जो परिणामस्वरूप जलमग्न होंगे। पूर्व गोदावरी जिले में लगभग 100 कब्रों के साथ 10,000 साल पुराना मैगैलिथिक दफन स्थल का पता चला है जिसमें पूर्व आंध्र संस्कृतियों के जन्म का प्रमाण है। इसमें चिंताएं हैं कि पुरातत्वविदों को विस्तार से अध्ययन करने से पहले यह इतिहास बन जाएगा, क्योंकि गोदावरी में बड़े पैमाने पर पोलावरम बांध बनाये जा रहे हैं। इसके अलावा, शोधकर्ताओं का अनुमान है कि लगभग 250 गांवों के लगभग 400,000 लोग बांध के कारण विस्थापित होंगे।

क्या भारत सरकार को यह नहीं पता कि क्यों अन्य देश अब अपने देश में प्रत्येक बांध की डीकमीशनिंग कर रहे हैं? यदि नहीं, तो निश्चित रूप से उनके व्यापारिक साझीदारों और धन उधारदाताओं ने उन्हें ये जरूर बताया होगा, जो इन नदी-जोड़ो परियोजनाओं को निष्पादित करने के लिए भारतीय नदियों को हजारों बांधों के साथ जंजीरों में बांधना चाहते है? क्या भारतीय नीति निर्माता हमें बता सकते हैं की क्यों 2015 तक अकेले अमेरिका ने 900 बाँध को हटा दिया और प्रत्येक वर्ष 60 और हटा रहे है? यदि नही तो इन नीति मिर्माताओं को मैं कृषि आतंकवाद पर हमारी रिपोर्ट पढने की सलाह देता हूँ ताकि वे पूरी भारतीय सभ्यता को खतरे में डालने से पहले उसकी भयावहता को जान लें।

अपनी 2013 की रिपोर्ट में नियंत्रक और ऑडिट जनरल CAG ने कहा, “हमने पाया है कि ASI ने सोथबी और क्रिस्टी द्वारा भारतीय प्राचीन वस्तुओं की बिक्री पर कभी भी कोई संज्ञान नही लिया या जानकारी एकत्र कि क्योंकि AAT अधिनियम, 1972 में ऐसा करने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।” ASI इस बात से सहमत है, “यह तब होता है जब कोई व्यक्ति बताता है कि एक विशेष कलाकृति चोरी हो गई है, तो हम अपने दूतावासों को इन नीलामियों को रोकने के लिए कह सकते हैं।” क्या भारतीय अधिकारि इन नीलामियों को रोक सकते हैं और रोकेंगे, अब जब यह बात हमने उनके ध्यान में लायी है?

भारत सरकार ने इस 1972 के अधिनियम में संशोधन का मसौदा तैयार किया है, जिसमें प्राचीन वस्तुएं और आर्ट ट्रेजरी विनियमन, निर्यात और आयात विधेयक (Antiquities and Art Treasures Regulation, Export and Import Bill), 2017 का ड्राफ्ट शामिल है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसे रोकने के बजाय नए बिल से मूर्ति चोरी और तस्करी की सुविधा होगी। एक पूर्व ASI अधिकारी ने स्वीकार किया है कि इससे चोरी कि हुई कलाकृतियों को प्राचीन वस्तुओं की दूकान में बिकने की एक बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। इस बीच, भारत के सांस्कृतिक विरासत की बिक्री हर दूसरे दिन नए मामलों के साथ लगातार बढ़ रही है। इन सांस्कृतिक खजाने की लूट की वास्तविक सीमा और इसके साथ चलने वाली धन-शोधन और आतंकवादी वित्तपोषण के खतरे को समझने के लिए भारतीय प्रशासन को बड़ा लम्बा रास्ता तय करना होगा।

ये तस्करी के रास्ते चाहे प्राचीन वस्तुएं, हीरे, तेल, ड्रग्स या अन्य का प्रयोग आतंकवादी वित्तपोषण में किया जाता है और यहां तक कि गुप्त कार्रवाईयों में भी। हमने हमारी कई रिपोर्टों में प्रदर्शित किया है कि ये हीरे, ड्रग्स, डीजल, सट्टेबाजी चैनल और मार्गों का इस्तेमाल भारत में विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में किया जाता रहा है – नवीनतम पठानकोट हमले में जहां अफगानिस्तान से भारत के लिए पुराने अफ़ीम तस्करी मार्गों का इस्तेमाल किया गया था जिसमे पंजाब पुलिस के अधीक्षक, सलीविंदर सिंह को हीरे के माध्यम से भुगतान किया गया था, जैसा कि उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के सामने कबूल किया था। ये सब जानने के बावजूद सभी पेंशन लाभों के साथ उन्हें क्लीन चिट और समयपूर्व सेवानिवृत्ति क्यों दी गयी? 2008 के मुंबई हमलों से लगभग 6 महीने पहले से ही भारत का वित्तीय खुफिया इकाई (FIU) आतंकवादियों की संदेहजनक गतिविधियों के लिए हीरा उद्योगों पर नजर रख रहा था और उन्होंने पता लगाया की विदेशी लेनदेन बेल्जियम से निकलकर सूरत हीरा कारखानों तक आ रहे थे। आखिर क्यों ये सबूत अदालत की सुनवाई में नही पेश किये गए और क्यों जांच एजेंसी ने इन सबूतों का अनुसरण नही किया? बेल्जियम स्थित हीरा डीलरों से डेविड हेडली के संबंधों के सुबूत पर जांच क्यों नही की गयी?

पंजाब नेशनल बैंक के धोखाधड़ी के लिए इन्ही पुराने मार्ग और चैनल का उपयोग किया गया। भारत से निकलने से कुछ महीने पहले ही नीरव ने बेल्जियम में अपनी प्रमुख कंपनी निरव मोदी लिमिटेड की सहायक कंपनी बनाई और घोटालों से प्राप्त पैसों का एक बहुत बड़ा हिस्सा दो कंपनियों नीरव मोदी लिमिटेड (11 अक्टूबर, 2017 को गठित) और निरव मोदी ज्वेल्स BVBA (2013 में एंटवर्प, बेल्जियम में स्थित ) में लगाया। इन्ही संदिग्ध गतिविधियों की वजह से बेल्जियम आधारित डायमंड डीलरों का नाम विश्व में हर ब्लैक मनी लॉन्ड्रिंग सूची में पाया जाता है। भारत सरकार को पहले से ही इस विषय में जानकारी है। इस सूची में कई लोग गुजराती हीरा व्यापारी हैं, जो पालनपुर पालनपुर से हैं और जिनके कार्यालय दुनिया भर में स्थित है। क्या यह सच नहीं है कि मई 2014 में काले धन शोधन मामले में आयकर विभाग ने आठ हीरे व्यापारियों को क्लीन चिट दिया था?

सूची में शीर्ष पर है एंटवर्प स्थित भारतीय मूल के हीरा व्यापारी दिलीप मेहता, रोज़ी ब्लू के सीईओ, जो दुनिया की सबसे बड़ी हीरा कंपनी है, जिसे डायमंड किंग भी कहा जाता है। बेल्जियम सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘बैरन’ का प्रतिष्ठित खिताब प्रदान करने के लिए चुना। यह चयन बेल्जियम के विदेश मंत्रालय और खुद बेल्जियम के रॉयल पैलेस द्वारा किया गया था।

हेडलाइन्स टुडे की जांच में पता चला है कि मेहता भाइयों (दिलीप, अरुण और हर्षद रमनीक लाल मेहता), जो कोच्चि IPL (उपरोक्त उल्लिखित घटना) में 12 प्रतिशत के हिस्सेदारी है, उनके पास LGT बैंक ऑफ लेचेंस्टीन में गुप्त खाते हैं। उन्होंने कथित रूप से धन जुटाया था, जो लक्ज़मबर्ग और ग्वेर्नसे के टैक्स हेवन से जुड़े हुए हैं। डायमंड फर्म रोसी ब्लू, जिसमें मेहता के शेयर हैं, का उपयोग विदेशों में वित्त पोषण के लिए इस्तेमाल किया गया था। ग्वेर्नसे में गुप्त ट्रस्टों द्वारा नियंत्रित शैल कंपनियां का प्रयोग बेईमानी से पैसा निकालने के लिए किया गया था। पाइन ट्रस्ट और बीच सेटलमेंट ने अवैध रूप से पैसा पार्क करने के लिए डयूश बैंक का उपयोग ट्रस्टी के रूप में किया।

इन बेल्जियम-आधारित हीरा डीलरों के खिलाफ कई ऐसे मामले और जांचें हैं, लेकिन हम अभी तक हमारी सरकार द्वारा उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं देख पा रहे हैं। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि इन हीरों के डीलरों के अंबानी और अदाणी के साथ घनिष्ठ व्यापार और पारिवारिक संबंध हैं जो राजनीतिक दलों के सत्ता में लाने वाले प्रमुख दाता हैं? अब हम जानते हैं कि मुकेश अंबानी की भतीजी इसाता सलगांवकर का विवाह नीरव के भाई नीशल मोदी से हुआ है और उनके पहले चचेरे भाई विपुल अंबानी मोदी की कंपनी में से किसी एक के सीएफओ हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि मुकेश अंबानी के सबसे बड़े पुत्र आकाश की शादी जल्द ही रसेल मेहता और मोना की बेटी श्लोक से होने वाली है, जो भारत में दिलीप मेहता की रोज़ी ब्लू डायमंड्स की मुखिया और नीरव मोदी की करीबी रिश्तेदार है?

इस प्रकार की धोखाधड़ी को रोकने के लिए, पुरानी स्थापित तस्करी मार्गों और धन-शोधन चैनलों को बाधित करना होगा और जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक हम ऐसी घटनाओं की पुनरावृति देखते रहेंगे। जिस तरह से भारतीय जांच और यहां तक कि खुफिया एजेंसियां ओरिएंटेड है, ऐसे काण्ड होते रहेंगे और किसी बड़े धोखाधड़ी के मामले के बाद ही हम कार्रवाई करेंगे। यदि इस संबंध में कोई ठोस कार्रवाई की योजना बनाई जाए तो ग्रेटगैमइंडिया को हमारी एजेंसियों की सहायता करने में प्रसन्नता होगी|

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Shelley Kasli
Shelley Kasli is the Co-founder and Editor at GreatGameIndia, a quarterly journal on geopolitics and international affairs. He can be reached at shelley.kasli@greatgameindia.com