Read this article in English: The Global War On Cash: Target India – Part 1

दुनिया भर के बड़े बैंक अधिकारी जो मुद्रा का आतंकवाद फैला रहे हैं, मौजूदा वक्त में, राजा या किसी भी सेना प्रमुख से ज़्यादा शक्तिशाली हैं, कहा जाए तो रोम के पोप से भी ज़्यादा। वो अपने हाथ कभी मैले नही करते। सामने से वो किसी हत्या में शामिल नही होते, प्रदर्शन में वो खुद को ताली बजाने तक सीमित रखते हैं। उनके अधिकारी जो कि अंतरराष्ट्रीय तकनीकी जानकार हैं वो हमारे देशों पर राज कर रहे हैं। जबकि न तो वो राष्ट्रपति हैं न ही मंत्री और न ही चुने गए, फिर भी वो वेतन का स्तर और जनता का खर्च, निवेश और विनिवेश, कीमत-दर, कर, ब्याजदर, आर्थिक सहायता, यहां तक कि कब सूरज उगता है और कितना पानी गिरा जायेगा ये भी वो ही तय करते हैं। दुर्भाग्यवश उनकी दिलचस्पी कारावास या बंदी शिविर (कंसंट्रेशनकैम्प), उन्मूलन केंद्र में नही है जबकि यही वो थॉर ठिकाने हैं जहां इस दुष्चक्र के नतीजे निश्चित तौर पर देखने को मिलते हैं। इन सबके प्रति इन बुद्धिजीवियों की अनुत्तरदेयता का विशेषाधिकार प्राप्त है और दावा यही करते हैं की वो निष्पक्ष हैं।

गालेआनो (१९९१) पेशेवर ज़िंदगी/ p. १o; ​जैसा की: शक्ति की विकृतियां: स्वास्थ्य, मानवाधिकार, और गरीबों पर नया युद्ध, में उद्धृत किया गया है।

उरुग्वे के साहित्यकार एडुआर्डो घुघेस गालेआनो ने ऊपर वर्णित पुस्तक मे, हाल ही में घटित विमुद्रीकरण (जिसमे ५००, १००० के चलित नोटों को बंद करके २००० के नए नोट का चलन शुरू किआ गया है) के द्वारा उपजी मनोस्तिथि के भाव को वर्णित किआ है। इन हालातों ने कई सवाल पैदा किये, विभ्रम उत्पन्न हुए, विश्लेषण जारी हुए, नई वैचारिक परिकल्पना सामने आईं और दोषारोपडों ने कई भ्रम पैदा किये, लगभग ये सभी बिंदु अर्थव्यवस्था के इर्द गिर्द भटकते रहे। पर कोई भी इस जोपोलिटिकल (भूराजनीति) ताकत को नहीं आंक पाया जिससे चलते हुए ये फैसला लिया गया था। वास्तव में भूराजनीति और अर्थव्यवस्था दो अलग अलग क्षेत्र हैं इसलिए जब अर्थशास्त्री अपने तय शुदा ढांचे से बाहर निकल कर बाहरी दुनिया से सामना करते हैं तो उन्हें भूराजनीति का एक अजनबी दलदल दिखाई देता है। वो अब एक ऐसी दुनिया से रूबरू होते हैं जिसके कायदे कानून उनके अब तक के जाने हुए चलन से बिल्कुल अलग हैं। इस रिपोर्ट में हम इनही भूराजनैतिक शक्तियों की पड़ताल करेंगे और घटनाक्रम की उन कड़ियाँ का सिंघावलोकन (सूक्ष्मपडताल) करेंगे जो हमे इस ध्रुवीकरण तक ले आयीं हैं।

इस लेख में निम्नलिखित पहलु शामिल है :

  • रीगनोमिक्स (पार्ट १):
  • वैश्विक चलित-धन संकट (ग्लोबल लिक्विडिटी क्राइसिस) (पार्ट १):
  • काले धन पर वैश्विक कार्रवाई (पार्ट २)
  • भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (पार्ट २)
  • बैलाउट का मौसम (पार्ट ३)
  • दरवाजे पर संकट (पार्ट ३)
  • नोटबंदी में क्रैश-कोर्स (पार्ट ४)
  • नकदी पर वैश्विक युद्ध (पार्ट ४)
  • ग्रेट इंडियन बैलाउट (पार्ट ५)
  • पारा – एक केंद्रीकृत अस्वस्थ बैंक (पार्ट ५)
  • एक ज़माने में (पार्ट ५)

रीगनोमिक्स

भारत के वर्तमान आर्थिक स्थिति के बीज सन ८o के दशक में ४oवे अमेरिकन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के द्वारा बोय गए थे। उन्होंने कुछ आर्थिक सुधार जारी किए जिसकी नींव इस विश्वास पर थी कि कर-नीति जो अमीरों को लाभ पंहुचाती है, गरीबों के लिए ‘trickle down effect’ (त्रकल डाउन मतलब नीचे टपकते हुए आगे की तरफ बढ़ना – ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट) अमीरों से गरीबों की ओर धन प्रवाह निर्मित करेगी। रोनाल्ड रीगन के आलोचकों ने इस नियोजन को ट्रिकल डाउन अर्थशास्त्र या ‘वूडू’ अर्थशास्त्र (जादुई अर्थशास्त्र) का नाम दिया है। इसे ‘रीगनोमिक्स’ नाम से भी जानते हैं। रीगानोमिक्स के सिद्धान्तनुसार अर्थशास्त्र के सामाजिक क्षेत्र के खर्च में कटौती, कर्मचारियों को ज़्यादा वेतन की मांग करने से रोकना, चाहे वह मजदूर संघ के अंतर्गत ही क्यों न हो, कर्मचारियों की स्वास्थ्य और सुरक्षा के स्तर में गिरावट और पर्यावरणीय रक्षा के नियमों में ढील देना है। इन योजनाओं की उत्पत्ति शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) से हुई थी और ये रीगन के ८३ के भाषण ‘Evil Empire’ (शैतानी सामराज्य) की बुनियाद थी जिसमे उनका मंद स्वर सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका को आक्रमक रवैय्या अपनानेे का था। नतीजन टॉप सीक्रेट नेशनल सिक्योरिटी डायरेक्टिव लागू की गईं (NSDDs)।

NSDD-66 में अमेरिका की नीति का कथन है कि, सोवियत अर्थशास्त्र को अमेरिकी नीतियों द्वारा तितर बितर किया जा सकता है, उनके ‘कूटनीतिक त्रय’ पर आक्रमण कर के। (त्रय means three) इस कूटनीतिक त्रय मे तीन आपातकालीन संसाधन का ज़िक्र है – वित्तीय खाता, उच्च तकनीक और प्राकृतिक गैस। यह निर्देशपत्र सोवियत यूनियन के खिलाफ आर्थिक युद्ध की गुप्त घोषणा थी।

यही नीतियाँ जब रूसीयों के द्वारा अपनायी गयीं तब ये ‘Glasnost और Perestroika’ (उदारीकरण और निजीकरण) के नाम से जानी गयीं और यही सोवियत संघ के लिए मृयु के घंटे के समान थी। यह नीतियां तब से पूरे संसार मे फैल चुकी हैं और दुनिया के कई राजनेतिक और आर्थिक अभिजात वर्ग के द्वारा सराही जा चुकी हैं। वो हर देश जहां इन्हें अमल किया गया नष्ट हुए हैं।

भारत मे हर्षद मेहता का लोकापवाद, अल्बानिया का पिरामिड मंसूबा, BCCI का विध्वंस, जापान और ब्रिटेन के रक्षा ग्रहों की तबाही वगैरह इन ही नीतियों के नतीजे हैं। बहराल एक दो धारी तलवार की तरह रीगानोमिक्स ने अमेरिकी मध्य वर्ग और अमेरिकन ड्रीम को भी नष्ट कर दिया।

वैश्विक चलित-धन संकट (ग्लोबल लिक्विडिटी क्राइसिस)

रीगनोमिक्स ने एक नई बैंकिंग प्रणाली को जन्म दिया जिसे Originate and Distribute यानी ORD मॉडल के नाम से जाना जाता है।  इतिहास में बैंक्स ऋण देने के लिए जमा पूंजी इस्तेमाल करती थी जो बैलेंस शीट के रूप में परिपक्वता (maturity) तक संभाल के रखा जाता था। इस नई प्रणाली के तहत अब बैंक एक ऐसा संस्थान नही रह गया था जिसका पूर्ण ध्यान बिंदु जमा पूंजी लेने और ऋण देने में हो। बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक कोशदाता (competetive fianancier) बन गया जो कि अपनी संपत्ति (assets) से ज़्यादा से ज़्यादा फीस और कमीशन इनकम निकलना चाहता था। पुरानी ढ़र्रे की दूरदर्शी बैंकिंग को उबाऊ और संकीर्ण समझा जाने लगा, वहीं जोखिम उठाने वालो को प्रगतिशील, नवीन और चतुर समझाया जाने लगा। इन नई quasi legal (कानूनी बल से नहीं बंधे) निवेश तकनीक और प्रत्यक्ष ठगी से एक नई योजना- पोंजी (ponzi) प्रचलन में आई। इस ने नींव खड़ी की सबप्राइम लैंडिंग (subprime lending) की (0% ब्याज दर के नीचे उन लोगों को कर्ज देना जिन्हें चुकाने में परेशानी हो) और कर्ज़ का प्रतिभूतिकरण (securitization of debt, बैंक के द्वारा एक व्यापार योग्य भंडार के रूप में गिरवी घरों को बेचना)। यह चलन पहले वॉलस्ट्रीट और फिर पूरी दुनिया मे फेलाया गया। इस प्रक्रिया को derivative मार्केट्स (योगिक बाजार) कहा जाता है।

२oo८ में जब जर्मन बैंक्स अपना कुछ अमेरिकी रियल एस्टेट निवेश कम करना चाहती थीं तब अमेरिकी बैंक, इन्शुुरेन्स कंपनीज़ और वॉलस्ट्रीट ब्रोकरेज फर्म्स की धोखाधड़ी की हदों का पर्दा फाश हुआ। इसके बाद आई अमेरिकी आर्थिक मंदी २oo८ और यूरोजोन संकट २o१२ और अगर हम अभी भी सचेत न हुए तो ऎसी स्थिति भारत मे बनेगी और इंडियन क्राइसिस २o२o कहलाई जाएगीl

पूरी दुनिया की GDP ५o trillion डॉलर की तुलना में १५o trillion डॉलर जितनी बडी रकम (अमाउंट) का डेरीवेटिव (योगिक) मार्किट खड़ा हो गया। नतीजन विश्व्यापी चलित धन का विकट संकट सामने आया। लिक्विडिटी क्राइसिस यानी चलित धन संकट  का मतलब है (accute) विकट कमी या चलित धन का सूखा पड़ना, आसान शब्द में कहें तो धन प्रवाह में भारी कमी। ये संकट अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ा, मोटे तौर पर लगभग १२.८ trillion डॉलर तक का नुकसान अमेरिका को उठाना पड़ा। और कुछ दूसरी रिपोर्ट्स के मुताबिक ये रकम १४ trillion डॉलर है जो कि अमेरिकी आर्थिक गतिविधि की लगभग एक साल की कीमत (worth) है। अर्थव्यवस्था से लेकर ग्रह प्रबंध (housing), स्वास्थ रक्षा (हेल्थ-केअर) से लेकर युद्ध संसाधसन तक, ऊर्जा से सुरक्षा तक हर चीज़ इस संकट के दायरे में आ गयी।

NASA द्वारा निर्मित २३o billion dollar के नक्षत्र कार्यक्रम (Constellation Program), “जिसके अंतर्गत मानवों का मंगल ग्रह पर पंहुचने का इरादा (plan) था”, के बजट में भारी कटौती हुई और अचानक हमारे करीब के चंद्रमा की तुलना में मंगल काफी दूर और काफी महंगा दिखाई पड़ने लगा। दुर्भाग्यवश ये पूरी परियोजना (project) इस हद तक नाकाम हुई कि अमेरिका को अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष अड्डे (International Space Station) पर पंहुचने तक के लिए भी रुसी राकेट (Russian rocket) की सवारी करनी पड़ी। यहां तक कि अमेरिका को रुस की जासूसी करने के लिए भी रुसी राकेट एंजिन का इस्तेमाल करना पड़ा। और अब मंगल ग्रह Orbiter मिशन (MOM, चलाऊ भाषा मे मंगलयान) की स्थापना के बाद भारत ने NASA की मंगल यात्रा के खर्च के केवल ग्यारवें प्रतिशत का इस्तेमाल कर मंगलयात्रा को पूरा कर इस ५.४ billion dollar सैटेलाइट लांचिंग उद्योग में धमाकेदार प्रवेश किया।

दूसरी ओर चीनीयों ने बडी मात्रा में यूरोपीय और अमेरिकी व्यवसायों मैं हिस्सेदारी लेनी शुरू कर दी। जिनमे (industrial enterprises) उद्योग उपक्रम शामिल हैं जो कि विश्व्यापी मंदी के कारण कम कीमतों में उपलब्ध थे। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के दुनिया भर में सौदे किये, तेल और खनिज तत्व की आपूर्ति हासिल की। अमेरिका की सबसे बड़ी कम्पनीयों पर आज चीनियों का स्वामित्व है। इन मे से एक है लेजेंडरी पिक्चर्स, वो स्टूडियो जिसने हमे बैट मैन सीरीज़ और इंटर्सटेलर दी, जो कि जल्द ही अपना नया प्रोडक्शन ज़ारी करेंगी जिसका नाम है – थे ग्रेट वॉल।

A.C मिलान, दुनिया के सबसे महंगे और सबसे मूल्यवान फुटबॉल क्लब की मालकियत हासिल करने के बाद अब चीनी यूरोपीय फुटबॉल के मंच को भी बदल रहे हैं। उनके। आज सौ से भी ज़्यादा सरकारी कन्फ़्यूशियस इंस्टिट्यूट्स हैं जो चीनी संस्कृति को यूरोप में प्रोत्साहन दे रहे हैं। ऐसा अप्रत्यक्ष संचार (soft power) सहज सुलभ है, उदाहरण के लिए चीनी टेलीकॉम कंपनी ZTE, पाय्टैयर्स में फ्रेंच कर्मचारियों को चीनी भाषा सीखा रहे हैं। ये सिर्फ कुछ छोटे हिस्से हैं, विशाल चीनी पहेली के जिसे हम न्यू सिल्क रूट या एक बेल्ट, एक रोड इनिशिएटिव के नाम से जानते है। विशेषज्ञों ने इसे चाइनीज़ सेंचुरी यानी चीनी शताब्दी का नाम दिया है।

पश्चिमी यूरोपीय अर्थ व्यवस्थाएं इस आर्थिक संकट के दौर में अभी भी पिस रहीं हैं। दूसरी ओर चीनी और रूसी ताकतें उनको इस गड्ढे में और धकेलने का काम कर रही हैं। हाल ही में, इस ही साल जनवरी के महीने में विश्वभर का अभिजात वर्ग वर्ल्ड इकनोमिक फोरम, डावोस में एकत्रित हुए और विश्वयापी चलित धन के संकट को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की और उलझनों पर भी जो उनकी अर्थ व्यवस्थाओं पर भारी पड़ेंगी। उन्हें भय है कि ये मंदी का दौर उनके लंदन और न्यूयॉर्क स्थित बैंकिंग हाउसेज़ जो कि अर्थव्यवस्था केंद्र हैं, की एकल स्वामित्वता का अंत न कर दे।

इसी निराशान्ध परिस्थिति के बीच भारत तस्वीर में आता है।

शेली कसली की इस विशेष ​नकदी पर वैश्विक युद्ध की शोध को पढ़े, जिसमें भारत पर इसके नोटबंडी पर प्रभाव के साथ एक नकद-रहित समाज की ओर धक्का देने के षड्‍यंत्र का अध्ययन किया गया है। यह शोध ग्रेट ग़मे इंडिया के अप्रैल-जून २o१७ नोटबंडी विशेष अंक में प्रकाशित किया गया है।

हिंदी अनुवाद – स्वप्निल सारस्वत, जो पुणे मैं मेकॅनिकल इंजिनियर है और जूननाईया सारस्वत

ग्रेट गेम इन्डिया – जिओपॉलिटिक्स और अन्तररास्ट्रीय मामलों पर भारत की एकमात्र त्रैमासिक पत्रिका

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Shelley Kasli
Shelley Kasli is the Co-founder and Editor at GreatGameIndia, a quarterly journal on geopolitics and international affairs. He can be reached at shelley.kasli@greatgameindia.com