Read this article in English – Aadhaar, Skynet & Death By Glitch

संयुक्त राष्ट्र संघ मानता है की अगर एक देश किसी दूसरे देश के नागरिकों का अपहरण करता है तो अपहरण करने वाला देश असल मायनों में मानवता के खिलाफ अपराध कर रहा है| लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ का ऐसा सोचना अमेरिका को आये-दिन विदेशी नागरिकों को CIA की ब्लैक-साइट्स में पूरी तरह असंवैधानिक तरीके से रखने से नहीं रोक पाया| अमेरिका की भाषा में इसे “एक्स्ट्रा आर्डिनरी रेंडीशन” कहा जाता है| पोलेंड जैसे देशों को रेंडीशन के लिए 15 मिलियन डॉलर तक दिए गए लेकिन अमेरिका को अंततः ढाई लाख डॉलर देने पड़ गए उन अपह्रत लोगों को जिनका टॉर्चर उसने किया|

रेंडीशन की इस विवादास्पद व्यवस्था पर तमाम बवाल और फ़िल्में तक बनने के बाद ओबामा प्रशासन ने इसे लगभग बंद ही कर दिया| लेकिन अब उनका ध्यान अपने दुश्मनों की मौत सुनिश्चित करने के लिए नए-नए तरीके ढूंढने में केंद्रित था| और ये तरीके वाइट हाउज़ में हर मंगलवार को तलाशे जाते थे| उस दौर में काउंटर-टेररिज्म की इन मीटिंग्स के चलते वाईट हाउज़ में मंगलवार टेरर ट्यूज़डे के नाम से जाने जाते थे|

इन मीटिगों में असल में एक चार्ट पर काम किया जाता था| और चार्ट होता था अमेरिका के टारगेट्स का जिन्हें CIA को ढूढ़ कर ड्रोन हमले में मारना होता या पूछताछ के लिए क़ैद करना होता था| ये सब काम ब्रिटेन के खुफिया गुप्तचरों के साथ मिल कर होता| इस चार्ट में मौजूद नामों को ओबामा की किल-लिस्ट कहा जाता था| वैसे किसी भी देश के पास ऐसी खुफिया किल-लिस्ट होना हैरान नहीं करता क्यूंकि हर देश अपने दुश्मनों को मारना चाहता है| लेकिन जो बात हैरान करती है वो ये की ओबामा की किल-लिस्ट सीधे स्काइनेट से जुडी हुई थी| जी हाँ, आपने सही पढ़ा| और ये किसी साइंस-फिक्शन की कहानी नहीं| ये एक तथ्य है|

स्काइनेट अमेरिकी खुफिया एजेंसी का एक प्रोग्राम है जो कम्युनिकेशन डेटा एनालिसिस की मदद से उन लोगों को तलाशता है जिन पर आतंकी गतिविधियों में सक्रीय होने का शक़ होता है| और तलाशता भी ऐसे है की उनकी कॉल-रिकार्ड्स और कॉल-लोकेशन की मदद से टर्मिनेटर सरीखे ड्रोन से उन पर हमला कर मार डालता है|   

आप सोच रहे होंगे की स्काइनेट और किल-लिस्ट के बीच कैसे तालमेल बैठता है और होता क्या है| चलिए आपको एक उदाहरण से समझाते हैं| बिलाल अब्दुल करीम एक अमेरिकी पत्रकार और डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर है और उसे इस किल-लिस्ट में रखा गया है| बिलाल को फिलहाल वो ड्रोन तलाश रहे हैं| वजह? वजह जान कर आप दंग रह जायेंगे|  

बिलाल दरअसल सीरिया में रह कर सीरिया पर पश्चिमी देशों से हो रहे हमलों की ख़बर पश्चिमी देशों तक पहुँचाने का काम कर रहा है| उसके इस रवैय्ये से नाराज़ अमेरिका ने उसे आतंकियों का प्रवक्ता मान लिया है| बिलाल अकेला ऐसा नहीं है जिसे स्काइनेट ड्रोन से शिकार के लिए तलाशा जा रहा है| उत्तर वज़ीरिस्तान शांति समिति के नेता मालिक जलाल की कहानी भी बिलाल जैसी है| ड्रोन के निशाने पर होने वाली भावना को बताते हुए जलाल कहते हैं,

“मेरी स्तिथि बड़ी अजीब है| मुझे पता है मैं किल-लिस्ट में हूँ| मुझे पता इसलिए है क्यूंकि न सिर्फ मुझे ये बताया गया है, मैंने तमाम बार हमलों को अनुभव भी किया है| चार बार मुझ पर मिज़ाइल हमला हो चुका है और शायद ये मेरी अच्छी किस्मत ही है जो मैं आज जिंदा हूँ| मैं दरअसल एक ब्ग-स्प्लैट (एक खौफ़नाक शब्द जो ड्रोन हमले के बाद बचे इंसानी शरीर के हिस्सों के लिए प्रयोग किया जाता है) बन ख़त्म नहीं होना चाहता| उससे भी एहम बात ये की मैं नहीं चाहता की मेरा परिवार इस हमले का शिकार हो या ड्रोंज़ के साये में इस डर के साथ जिए की किसी भी पल एक मिज़ाइल आयेगी और उन्हें तबाह कर देगी| हालत अब ऐसी हो गयी है की दोस्त मुझसे मिलते नहीं| ड्रोंज़ का डर ऐसा है की मैं घर के बाहर पेड़ों के नीचे सोता हूँ की कहीं ड्रोन आकर हमला न कर दे और मेरे साथ मेरा घर भी मारा जाए|”

ऐसा ही एक और केस है अल जज़ीरा के इस्लामाबाद ब्यूरो चीफ मुअफाक़ ज़ैदान का| ज़ैदान भी किल-लिस्ट में हैं और यहाँ ये जानना रोचक हो जाता है की आखिर ये पत्रकार कैसे आतंकी घोषित हो जाते हैं और किल-लिस्ट में डाल दिए जाते हैं| वजह एक बार फिर खौफ़नाक हैं|

अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था NSA के भूतपूर्व निदेशक माइकल हेडन ने एक बार कहा था, “हम मेटा-डेटा के आधार पर लोगों को मारते हैं|” मेटाडेटा वो डेटा होता है जो दूसरे किसी डेटा की जानकारी देता है| मतलब अगर कोई पत्रकार किसी आतंकी का इंटरव्यू भी कर रहा है तो वो मेटाडेटा में आ जायेगा और हिटलिस्ट में शामिल हो जायेगा| स्काइनेट के अल्गोरिदम इस बात का फर्क नहीं कर पाती की कोई अगर आतंकी के पास है तो क्यों है| कोई पत्रकार अगर आतंकी का इंटरव्यू भी ले रहा है तो मेटाडेटा में वो आतंकी ही बन जायेगा| और तथाकथित सर्वज्ञानी अमरीका की आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स की महारत स्काइनेट की इस अल्गोरिदम में फेल हो जाती है| और इसके चलते स्काइनेट द्वारा मेंटेन किये जाने वाले आतंकियों के डाटाबेस (TIDE – Terrorist Identities Datamart Environment) में शक़ के आधार पर दस लाख से ज़्यादा नाम हैं|

स्काइनेट की अल्गोरिदम कुछ ऐसे काम करती है की मेटाडेटा की एनालिसिस के आधार पर TIDE में मौजूद हर व्यक्ति का एक स्कोर तैयार किया जाता| वो एनालिसिस असल आतंकियों को ज़्यादा स्कोर और मासूम नागरिकों को कम स्कोर देती है| लेकिन मुद्दा ये है की क्या ये एनालिसिस विश्वसनीय है?

NSA स्काइनेट की विश्वसनीयता तय करने के लिए बिना किसी पूर्वाग्रह के एक लाख अनजान लोगों के मोबाइल नम्बर डेटा के आधार पर एक सेट तैयार करती है| साथ ही सात आतंकियों का एक ग्रुप तैयार होता है| अब NSA अपनी अल्गोरिदम में छह आतंकियों का डेटा फीड करती है और उस निर्देश देता है की बनाए गए डेटा सेट्स से सातवें आतंकी का पता लगाये| ऐसा करने से स्काइनेट की विश्वसनीयता का प्रतिशत तय होता है|

डेटा साइंटिस्ट और ह्यूमन राइट्स डेटा एनालिसिस ग्रुप के निदेशक पैट्रिक बॉल, जो की तमाम बार एक एक्सपर्ट के तौर पर युद्ध अपराध अधिकरणों में बयान दे चुके हैं, NSA के तरीकों को निहायत ही अतिवादी और बिलकुल ही बकवास कह चुके हैं| उनके अनुसार NSA जिस तरीके से इस अल्गोरिदम को बनाता है वो इसके नतीजों को एकदम अवैज्ञानिक बना देता है|

अगर इस अल्गोरिदम के मुताबिक पचास प्रतिशत असल आतंकियों को न मारा जाए तब भी 0.18 प्रतिशत मासूम नागरिक मारे जायेंगे| मतलब हज़ारों बेक़सूर लोगों को अपनी जान गवानी पड़ेगी| एक बार को अगर NSA का 0.0008 प्रतिशत गलती होने के आंकड़े को मान लिया जाए तब भी तमाम मासूम लोग मारे जायेंगे| अगर ये अल्गोरिदम 0.18 प्रतिशत की दर से भी गलत नतीजे देती है तो इसका मतलब ये होगा की 5.5 करोड़ लोगों में 99,000 बेक़सूर लोगों पर आतंकी होने का टैग लग जायेगा|

इसका मतलब ये हुआ की TIDE किल-लिस्ट में मौजूद हर एक व्यक्ति बस एक खुफिया अल्गोरिदम के आधार पर मारा जा सकता है| अगर अल्गोरिदम 0.18 की दर से भी गलत नतीजे देती है तो भी तमाम लोग सिर्फ किसी मेटा डेटा के आधार पर मारे जायेंगे| शायद इसी को गलती से मरना कहते हैं|

अब आप सोच रहे होंगे की इस सब से आधार का क्या लेना देना|

आपको जान कर हैरत होगी की अधिकाँश भारतीयों को पता ही नहीं की NSA द्वारा भारत के कम्युनिकेशन ट्राफिक पर बेहद पैनी नज़र और निगरानी रखी जाती है| इतनी गहन निगरानी जितनी अमेरिका चीन, रशिया, ईरान और सऊदी अरब में भी नहीं करता| पश्चिमी दुनिया के इस बेहद खुफिया राज़ की जड़ें ब्रिटिश राज के खुफिया नेटवर्क में जमी हैं|

दरअसल ऐसे किसी केन्द्रीय निगरानी प्रणाली की परिकल्पना ईस्ट इंडिया कंपनी के दर्शन-शास्त्री जेरेमी बेन्थैम ने माउंटबेटन के सुझाव पर की थी| और इस परिकल्पना से जन्म लिया था फाइव-आइय्ज़ कार्यक्रम ने| और आधार दरअसल इसी फाइव-आइय्ज़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक मोडर्न निगरानी कार्यक्रम का हिस्सा है|

ब्रिटिश कॉलोनियों पर नज़र बनाए रखने के लिए बनाये गए इस फाइव आइय्ज़ कार्यक्रम, जिसे प्रोजेक्ट एशेलौन भी कहा जाता है, के अंतर्गत भारत से भारत सरकार की जानकारी में अपने लिए एहम जानकारियां जुटाई जाती हैं| जी हाँ| भारत आधिकारिक रूप से ब्रिटिश एम्पायर का हिस्सा है|

अगर ऐसा नहीं है तो आखिर क्यों आधार प्रोजेक्ट के लिए भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा CIA, FBI और होमलैंड सिक्यूरिटी के निदेशकों को काम का ठेका दिया गया? ये सभी लोग मोर्फो, एल1/सफरान आदि कम्पनियों के भी निदेशक हैं और ये सभी कम्पनियां आधार के लिए काम कर रही हैं| क्या आपको पता है, अमेरिका की पेट्रियट एक्ट के तहत ये सभी लोग आधार डेटा का अमरीकी सरकार तक पहुंचाना सुनिश्चित करते हैं?

अब आधार भले ही एक नम्बर हो, लेकिन जब उस नम्बर को आपसे जुड़े हर दस्तावेज़ से जोड़ दिया जायेगा तो वो नम्बर एक मास्टर की बन जायेगा| और आधार के माध्यम से NSA का हर नागरिक की 360 डिग्री प्रोफ़ाइल अपने हाथ में रखने का उद्देश्य पूरा होता है|

स्काईनेट को काम करने के लिए सिर्फ आपका डेटा चाहिए| आपका ट्रेवल, कम्युनिकेशन, सोशल मीडिया, मेडिकल हिस्ट्री, ख़रीदारी, फैमिली आदि से रिलेटेड सब डेटा और मेटाडेटा इस सीक्रेट अल्गोरिदम में फीड किया जाता है और ये अपनी 1 परसेंट से भी कम एफिशिएंसी से निर्धारित करेगा की आप आतंकी हैं या नहीं|

अमेरिका की फोरेन इंटेलिजेंस सर्वेलेंस एक्ट (FISA) के अंतर्गत NSA को ये अधिकार है की वो भारतीय सर्वर, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि किसी भी चीज़ पर नज़र रख सकता है जिसे वो ठीक समझे| और इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए जो अमेरिकी कम्पनियां भारत में काम कर रही हैं, वो ये डेटा एक्सेस कराने का काम करती हैं| ऐसी ही कुछ कम्पनियों को भारत सरकार ने आधार प्रोजेक्ट में काम दे रखा है|

NSA किस हद तक आप पर नज़र रखना चाहती है वो इसी बात से समझा जा सकता है की वो इसे “होल-लाइफ” स्ट्रेटेजी कहती है और इसके अंतर्गत आपके जीवन से जुड़ा हर डेटा—सोशल मीडिया, बायोमेट्रिक, आवाज़, पर्सनल हिस्ट्री – आधार, फ़ेसबुक, आमज़ॉन, आरटेल, ज़ि-मैल आदि — सब स्काइनेट में फीड किया जाता है|

NSA के शब्दों में “ये सब अंततः व्यक्तियों पर निरंतरता के साथ हर वक़्त हर समय नज़र बनाए रखने के लिए है| हम सिर्फ परंपरागत कम्युनिकेशन के पीछे नहीं हैं| हमारा चौतरफ़ा अप्रोच है..|” और भारतीय एजेंसियां और नीति निर्माता इस बात से अनजान हैं की डिजिटल इंडिया के नाम से उन्होंने जो बनाया है वो दरअसल अमरीकी एजेंसियों की इस चौतरफ़ा निगरानी के लिए एक आसान रास्ता है|

फिलहाल अगर ये सब डेटा स्काइनेट की सीक्रेट अल्गोरिदम में फीड किया जाए और वो आपको आतंकी के रूप में टारगेट करता है तो अगर आप अफ़ग़ानिस्तान में हैं तो आप पर कभी भी एक ड्रोन के ज़रिये मिज़ाइल दागी जा सकती है| और ये सब भारत में भी किया जा सकता है|

NSA के पास अपने नई दिल्ली स्तिथ ख़ुफ़िया अड्डे पर, जिसका कोडनेम डेज़ी है, APPARITION के रूप में एक बेहद शक्तिशाली सॉफ्टवेयर है जो संवेदनशील जगहों से इन्टरनेट का प्रयोग करने वाले लोगों की सटीक लोकेशन बताता है| इसी सॉफ्टवेयर के प्रयोग के साथ अगर चाहा जाए तो बेहद सुगम तरीके से किसी हमलावर ड्रोन के ज़रिये शिकार को मारा जा सकता है|

यक़ीनन भारत एक युद्ध भूमि नहीं है, लेकिन एक वक़्त में इराक़, लीबिया, लेबनान, यमन आदि भी नहीं थे| मगर जैसे ही इन देशों ने एंग्लो-अमेरिकन दायरे के बहार निकलने की कोशिश की, उनका हश्र ये हुआ की वो आज युद्ध भूमि में तब्दील हो गए| तो ये सोचना की ऐसा भारत में नहीं हो सकता, सिर्फ बचपना है|     

लेकिन यहाँ एक पेंच है| ये पूरा ओपरेशन, स्काइनेट की अल्गोरिदम की सटीकता पर निर्भर है| जो की फिलहाल १ प्रतिशत से कम है| अब सोचिये इसे अगर आधार के गलत होने की सम्भावना, जो की 0.057 है, से जोड़ दिया जाये तो क्या हो सकता है? आइये समझते हैं इसका मतलब|

जैसे ही कोई डाटाबेस सिस्टम किसी डेटा को पहचानने में गलती कर उसे किसी और केटेगरी में दाल देता है, उसे तकनीकी भाषा में फाल्स-पोज़िटिव कहा जाता है| दूसरे शब्दों में अगर आधार डेटाबेस किसी नागरिक को पहचानने में अक्षम होता है या किसी और के साथ कन्फ्यूज़ करता है तो उसे फाल्स-पोज़िटिव कहते हैं| जैसे ही कोई फाल्स-पोजिटिव केस आता है उसे इंसानी जांच से गुज़रना होता है क्यूंकि कंप्यूटर उसे जांच नहीं पाया| तो अब ज़रा अंदाज़ा लगाइए की भारत को कितने फाल्स-पोज़िटिव केसेज़ की उम्मीद होनी चाहिए?

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) की एक रिपोर्ट में FPIR (False Positive Identification Rate) का उल्लेख करते हुए कहा गया है की “हम यहाँ तक देख पा रहे हैं जब FIPR 0.0025 % हो|” दूसरे शब्दों में हर एक लाख डेटा कम्पैरीज़न पर UIDAI को 21/2 फाल्स पोज़िटिव मिलेंगे|

अब ज़रा गणित से समझा जाए की UIDAI को कुल कितने फाल्स-पोज़िटिव मिलेंगे| UIDAI को 7.2 x 1017 कम्पैरिज़न करने होंगे| इसका मतलब कुल (7.2 x 1017) x (2.5 x 10-5) = 1.8 x 1013 = 18,000,000,000,000 फाल्स-पोज़िटिव केसेज़ का निस्तारण करना होगा|

आधार आधारित विशिष्टता सिद्ध करने के लिए हर एक भारतीय को 15,000 फाल्स-पोज़िटिव केसेज़ की जांच और निस्तारण करना होगा| और जब तक ये सब हो पायेगा, न जाने कितने मर जायेंगे और न जाने कितने नए भारतीय पैदा हो जायेंगे| सरल शब्दों में कहा जाए तो UIDAI के खुद के शब्दों में अब्सोल्युट यूनीकनेस या विशिष्टता हासिल की ही नहीं जा सकती| कम से कम व्यावहारिक रूप से तो नहीं| और अगर हासिल हो भी गयी, तो तब तक आधार खुद ही फाल्स-पोजिटिव्ज़ के किसी समंदर में डूब चूका होगा|

आगे बात की जाए तो इसका मतलब ये निकलेगा की स्काइनेट की किल-लिस्ट में मौजूद हर इंसान के मरने से पहले तमाम बेकसूरों को मरना पड़ेगा क्यूंकि उनका सिस्टम पत्रकार और आतंकी में फर्क नहीं लार पाता| और इस तथाकथित जीनियस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के चलते न जाने कितने मासूम और बेकसूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और इस सब के लिए अमरीकी इंटेलिजेंस और यहाँ तक की वहां के राष्ट्रपति तक को कोर्ट में घसीटा जा चूका है|


तो अब आपके सामने है की भारत ने नीति निर्माताओं ने डिजिटल इण्डिया के नाम पर आपके लिए कैसे भविष्य की खौफ़नाक तस्वीर बनायी है| ऐसी तस्वीर जिसमें विदेशी खुफिया एजेंसियों को देश की अखंडता और सुरक्षा से खिलवाड़ का हक दिया गया है|

लेख – शेली कसली

हिंदी अनुवाद – निशांत, जो एक लखनऊ स्थिति पत्रकार और लेखक है| वे कहानी कैफे नामक एक यूट्यूब चॅनेल भी चालते है|

शेयर करें
Shelley Kasli
Shelley Kasli is the Co-founder and Editor at GreatGameIndia, a quarterly journal on geopolitics and international affairs. He can be reached at shelley.kasli@greatgameindia.com